
सुभाष चंद्र बोस से अब क्यों चिढ़ रहा है ब्रिटिश इको सिस्टम? नाजी विचारधारा और हिटलर का दिया हवाला!
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सुभाषचंद्र बोस की जर्मन तानाशाह हिटलर से मुलाकात का मात्र एक मकसद भारत की आजादी की लड़ाई को धार और रफ्तार देना था. सुभाष बाबू दूर-दूर तक नाजी विचारधारा से इत्तेफाक नहीं रखते थे. लेकिन बोस को इस मुलाकात के लिए घेरने वाले श्वेत वर्चस्व (white supremacist) कभी चर्चिल की कारगुजारियों पर खुद से सवाल नहीं पूछते हैं.
बंगाल के दुर्भिक्ष में लाखों भारतीयों का निवाला छीनने वाले, जालियांवाला बाग में निहत्थे हिन्दुस्तानियों पर गोलियां बरसाने वाले, भारत से खरबों डॉलर लूट कर अपनी तिजोरी भरने वाले अंग्रेजों को आज भी इस बात पर आपत्ति है कि सुभाष चंद्र बोस भारत को आजाद कराने की कोशिश में जर्मनी के तानाशाह हिटलर से मदद मांगने क्यों चले गये?
उसी महज एक मुलाकात को यादकर अंग्रेज 82 साल बाद भी भारत का ताना दे रहे हैं. सैम बिडवेल और उसके जैसे कइयों की बोस से नाराजगी की यही वजह है.
सैम बिडवेल कौन है ये बताएंगे पहले संदर्भ समझिए.
बात 23 जनवरी की है. सुभाष चंद्र बोस की जयंती थी. भारत सरकार इस दिन को पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाती है. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब उन्हें याद करते हुए नमन किया तो भारत से हजारों मील दूर बैठे कुछ ब्रिटिश नस्लवादी चिढ़ गये. पीएम मोदी द्वारा एक्स पर किये गये पोस्ट पर ब्रिटिश इंटेलिजेंसिया ने भारत की आलोचना की और सुभाष चंद्र बोस को नाजियों का हितैषी बताया.
हालांकि ये अंग्रेज अपने प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की करतूतों को याद करना भूल गये. जिसने बंगाल के अकाल के दौरान भारतीयों का राशन काट दिया था और लाखों भारतीय कंकाल बनकर मरने को मजबूर हुए.
लेकिन इस दफे इंडियन यूजर्स नहीं चुके उन्होंने अंग्रजों को चर्चिल की एक-एक गुनाह की लिस्ट याद दिला दी.

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