
मोबाइल-लैपटॉप के पासवर्ड से लेकर कड़े सवाल तक, अमेरिकी इमिग्रेशन अधिकारी घुसपैठियों की कैसे कर रहे छंटनी?
AajTak
अमेरिका में अब गेहूं के साथ घुन भी पिसता लग रहा है. दरअसल अवैध प्रवासियों पर डोनाल्ड ट्रंप की सख्ती की जद में वे लोग भी आ रहे हैं, जिनके पास वैध दस्तावेज हैं. यहां तक कि शक के आधार पर उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजा जा रहा है. लेकिन यूएस में एंट्री लेते हुए यात्रियों के पास क्या अधिकार हैं, जो उन्हें सुरक्षित रख सकें.
डोनाल्ड ट्रंप ने वाइट हाउस आते ही अमेरिका से घुसपैठियों को छांटना शुरू कर दिया. लोगों को वापस उनके देश लौटाया जा रहा है. ट्रंप प्रशासन वो सारे काम कर रहा है, जिससे गैर-अमेरिकियों का सीमा पार करना मुश्किल हो जाए. इसमें बॉर्डर पर सुरक्षा बढ़ाने से लेकर नए-नए एक्ट लागू करना भी शामिल है. इमिग्रेशन पॉलिसी इस हद तक हार्डलाइन हो चुकी कि दस्तावेजों और वीजा के साथ आने वाले लोग भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर धरे जा रहे हैं.
क्या हो रहा है अभी
पिछले कुछ हफ्तों से ऐसी रिपोर्ट आ रही हैं कि इमिग्रेशन अधिकारी अमेरिका आने वाले पर्यटकों को भी डिटेंशन सेंटर में डाल रहे हैं. कई ऐसे उदाहरणों पर दुनियाभर में चर्चा हुई. एक ब्रिटिश महिला ने आरोप लगाया कि इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट ने उन्हें यूएस-कनाडा सीमा पर पकड़कर तीन हफ्तों के लिए डिटेंशन सेंटर में डाल दिया. कनाडा और जर्मनी के नागरिक भी लगातार ऐसी शिकायतें कर रहे हैं, जो शक के आधार पर पकड़े गए.
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, कई ऐसे लोगों को भी अमेरिका आने से रोका जा रहा है, जो राष्ट्रपति ट्रंप को लेकर क्रिटिकल रहे. मसलन, एक फ्रेंच वैज्ञानिक को एयरपोर्ट से ही लौटा दिया गया, जिनके मोबाइल में ट्रंप की नीतियों को लेकर नाखुशी वाला कंटेंट था. कुल मिलाकर, माहौल ऐसा बना हुआ है, जिसमें पक्के कागजात वाले पर्यटक भी डरे हुए हैं कि वे अमेरिकी एयरपोर्ट पर लैंड करेंगे तो क्या होगा. जानिए, वैध टूरिस्ट के तौर पर आपके हक क्या हैं.
मेरे पास सारे दस्तावेज वैध हैं. क्या इसके बाद कस्टम अधिकारी मेरी जांच कर सकते हैं? हां. इसके बाद भी कस्टम्स को ये अधिकार है कि वो पर्यटकों की पूरी जांच कर पक्का कर सके कि वो यूएस में एंट्री ले सकता है. इसके तहत यात्री के पास मौजूद सामान को भी चेक किया जा सकता है.

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जायेद अल नहयान के भारत दौरे ने पाकिस्तान में फिर से पुरानी डिबेट छेड़ दी है. पाकिस्तान के विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी नेतृत्व की वजह से हमें भारत की तुलना में हमेशा कमतर आंका जाता है. पाकिस्तान में इस दौरे को मिडिल ईस्ट मे पैदा हुए हालात और सऊदी अरब -पाकिस्तान के संबंधों के बरक्श देखा जा रहा है.

यूरोप में कुछ बेहद तेजी से दरक रहा है. ये यूरोपीय संघ और अमेरिका का रिश्ता है, जिसकी मिसालें दी जाती थीं. छोटा‑मोटा झगड़ा पहले से था, लेकिन ग्रीनलैंड ने इसे बड़ा कर दिया. डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोहरा रहे हैं कि उन्हें हर हाल में ग्रीनलैंड चाहिए. यूरोप अड़ा हुआ है कि अमेरिका ही विस्तारवादी हो जाए तो किसकी मिसालें दी जाएंगी.

डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते हैं. उनका मानना है कि डेनमार्क के अधीन आने वाला यह अर्द्ध स्वायत्त देश अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी है. इसे पाने के लिए वे सैन्य जोर भी लगा सकते हैं. इधर ग्रीनलैंड के पास सेना के नाम पर डेनिश मिलिट्री है. साथ ही बर्फीले इलाके हैं, जहां आम सैनिक नहीं पहुंच सकते.

गुरु गोलवलकर मानते थे कि चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है. उन्होंने भारत सरकार को हमेशा याद दिलाया कि चीन से सतर्क रहने की जरूरत है. लेकिन गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे उन्हों 'उन्मादी' कह दिया जाता था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

यूरोपीय संघ के राजदूतों ने रविवार यानि 18 जनवरी को बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में आपात बैठक की. यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस धमकी के बाद बुलाई गई. जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर कई यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कही है. जर्मनी और फ्रांस सहित यूरोपीय संध के प्रमुख देशों ने ट्रंप की इस धमकी की कड़ी निंदा की है.

दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति बनने की आशंका बढ़ रही है. अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय नीतियां विवादों में हैं, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की तुलना हिटलर की तानाशाही से की जा रही है. वेनेज़ुएला पर हमला करने और ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की धमकी के बाद अमेरिका ने यूरोप के आठ NATO देशों पर टैरिफ लगाया है.







