
बिहार: सीएम की कुर्सी छोड़ना चाहते हैं नीतीश? जाहिर की ये ख्वाहिश
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विधानसभा के अपने चेंबर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री ने अपने दिल की बात कह दी. नीतीश कुमार की बातचीत से ऐसा लगा जैसे अब बिहार की बागडोर दूसरे को सौंपकर, राज्यसभा की सदस्यता लेना चाहते हैं.
बिहार में कमोवेश दो दशकों तक मुख्यमंत्री के रूप में शासन करने वाले नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अब हस्तिनापुर में बाकी का सियासी जीवन बिताने की सोच रहे हैं. ऐसा नहीं है कि उन्हें बिहार से मोह और लगाव खत्म हो गया है. लेकिन, अब वे सोच रहे हैं कि वे सबकुछ बन गए- विधायक रहे, सांसद रहे, मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में कैबिनेट मंत्री रहे, लेकिन राज्यसभा सदस्य नहीं रहे. एक बार उन्हें राज्यसभा की सदस्यता मिल जाए, तो फिर उनका सियासी जीवन पूरा हो जाए. लेकिन सवाल ये है कि बिहार में मुख्यमंत्री रहते, ये सबकुछ संभव नहीं होगा. इसलिए वो बिहार की सियासत में 'मुक्ति मार्ग' की तलाश में हैं.
विधानसभा के अपने चेंबर में पत्रकारों से बातचीत में, बुधवार मुख्यमंत्री काफी खुले दिल से बोल रहे थे. हालांकि बातचीत बिल्कुल अनौपचारिक थी, इसलिए पत्रकारों ने भी उनसे कई बातें, बातों-बातों में ही पूछ डालीं. चेंबर में बैठे कई मीडिया संस्थान के पत्रकारों ने जब बातचीत में उनसे पूछा कि इन दिनों वे बिहार के दौरे पर हैं, खासकर अपने पुराने लोकसभा क्षेत्र बाढ़ का दौरा भी कर रहे हैं. क्या ये समझा जाए कि आगामी लोकसभा चुनाव में वे अपने पुराने क्षेत्र से उम्मीदवार हो सकते हैं. इस पर मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है और ये दौरा बहुत पहले से तय था. गत दो सालों में कोरोना की वजह से उधर जा नहीं पाया. इसलिए अभी दौरा कर रहा हूं. उन्होंने कहा कि नालंदा से उनकी पार्टी 1996 से लगातार जीत रही है. उन्हें वहां चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है. 1996 सबसे पहले जॉर्ज फर्नाडीस को लड़वाया था.अब तक नहीं बने राज्यसभा सदस्य
इस बातचीत में नीतीश ने कहा कि वो अब तक राज्यसभा के सदस्य नहीं बने हैं. उन्होंने कहा कि फिलहाल वे बिहार की जनता की सेवा कर रहे हैं. यहां की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. यहां राज्य की बागडोर हमारे हाथ में है. नीतीश कुमार की इस 'दिल की बात' के बाद तमाम कयास लगना शुरू हो गई हैं. चर्चा है कि उन्हें अब बिहार की बागडोर दूसरे को सौंपकर, राज्यसभा की सदस्यता भाएगी. वैसे भी उनके राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बनने की चर्चा जोरों पर है.
नीतीश का राजनीतिक सफ़र
नीतीश कुमार के सियासी कैरियर को देखें तो वे 1985 में पहली बार विधायक बने. उसके बाद लोकसभा के बाढ़ संसदीय क्षेत्र से 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और नालंदा से 2004 में सांसद रहे. 2005 नवंबर में जब मुख्यमंत्री चुने गए तब उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता ले ली. नीतीश कुमार ने औनपचारिक बातचीत में पत्रकारों से अपने दिल की बात कह दी. इधर उन्हें लेकर बिहार के सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गरम है. राजद नेता तो यहां तक कहते फिर रहे हैं कि नीतीश कुमार अब बिहार को छोड़कर दिल्ली जाने की फिराक में हैं.
चर्चा यह भी है कि बीजेपी उन्हें उप राष्ट्रपति बनने का ऑफर देगी, तो उनका राज्यसभा जाने का सपना भी पूरा हो जाएगा. नीतीश कुमार हाल ही में योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री से मिले और बीजेपी से उनके रिश्ते पहले से ज्यादा प्रगाढ़ दिखे. चर्चाओं का बाजार यहां तक गर्म है कि बिहार के बोचहां उपचुनाव में उन्हें प्रचार करने के लिए बीजेपी ने विधिवत और विशेष रूप से साग्रह निवेदन किया है. इन सब बातों को देखते हुए सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि नीतीश पहले से ज्यादा बीजेपी के करीबी हो गए हैं और अपनी सियासी सेवानिवृत्ति में कोई झोल नहीं चाहते हैं, इसलिए मुक्तिमार्ग की तलाश में हैं.

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