
बांग्लादेश के बाद भारत के पड़ोस में बनने वाला है एक और स्वतंत्र देश? जीत के मुहाने पर विद्रोही सेना!
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भारत के पड़ोस का एक सिरा विद्रोह की आग से जल रहा है. स्थिति ऐसी है कि यहां एक नए राष्ट्र का उदय हो सकता है. विद्रोही सेनाएं म्यांमार सरकार से एक के बाद एक भौगोलिक क्षेत्र छीनते जा रहे हैं. यहां विद्रोहियों की स्थिति ऐसी है कि अपने करोड़ों डॉलर के निवेश को सुरक्षित रखने के लिए भारत और चीन को दखल देना पड़ा है.
यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान (यूएलए) और इसकी मिलिट्री ब्रांच अराकान आर्मी उस लक्ष्य को हासिल करने के बहुत करीब है जो तीन महीने पहले तक असंभव सा प्रतीत होता था. ये लक्ष्य है स्वतंत्रता हासिल करने का. एक स्वतंत्र देश बनाने का. अराकान आर्मी ने म्यांमार यूनियन के रखाइन (पूर्व में अराकान) राज्य के 18 में से 15 शहरों पर पहले ही कब्जा कर लिया है.
हालांकि तीन अहम स्थान अभी भी म्यांमार (बर्मा) की सैन्य सत्ता के हाथों में हैं. ये स्थान हैं बंगाल की खाडी में स्थित सित्तेव बंदरगाह. इस पोर्ट को कालाधान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट के तहत भारत ने फाइनेंस किया है. दूसरा स्थान है चीन की मदद से बना क्याउकफ्यू पोर्ट और तीसरी जगह है मुआनांग शहर.
वर्ष 2024 के आखिरी दिन अराकान आर्मी ने ग्वा शहर को अपने कब्जे में ले लिया. पिछले सप्ताह विद्रोही अराकान आर्मी अन शहर पर कब्जा किया था. इस शहर के रणनीतिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन पश्चिमी मिलिट्री के क्षेत्रीय कमांड का मुख्यालय है.
कुछ ही दिन पहले अराकान आर्मी ने माउंगडॉ नगर को सेना के हाथों से छीन लिया था और इसी के साथ अराकान आर्मी का बांग्लादेश के साथ लगती सीमा पर पूरी तरह से कब्जा हो गया है.
यदि ये विद्रोही गुट पूरे रखाइन प्रांत पर कब्जा करने और स्वतंत्रता की घोषणा करने में सफल हो जाते हैं, तो यह 1971 में बांग्लादेश के जन्म के बाद एशिया में पहला सफल अलगाववादी सैन्य अभियान होगा. इसके फलस्वरूप भारत के पड़ोस में एक नए देश का जन्म हो सकता है.
रखाइन प्रांत के अधिकांश हिस्से और चिन राज्य के रणनीतिक शहर पलेतवा पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद, यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान-अराकान आर्मी ने सैन्य जुंटा से बात करने पर सहमति जताई है. दोनों पक्षों ने इसके लिए चीन की मध्यस्थता में हुए हाइगेंग समझौते का सहारा लिया है. जनवरी 2024 में चीन की अगुआई में हुए इस समझौते में कहा गया है कि, "हम हमेशा सैन्य समाधानों के बजाय राजनीतिक संवाद के माध्यम से मौजूदा आंतरिक मुद्दों को हल करने के लिए तैयार रहते हैं."

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