
बंगाल के चक्र'व्यूह' में घिरी हैं ममता बनर्जी, 2016 के चुनाव से कितने अलग हैं हालात?
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दीदी जानती हैं कि बंगाल में सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह काफी हद तक सीएम की सीट पर निर्भर करता है. साल 2011 का चुनाव इसका उदाहरण है जब वामो ने सत्ता गंवाई थी, तब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट नहीं बचा पाए थे.
बंगाल की जनता ने जिसपर भी भरोसा किया, दिल खोलकर किया. जिसको भी सत्ता सौंपी, लंबे समय के लिए सौंपी. बंगाल का सियासी मिजाज बड़ा ही स्थिर रहा है तभी तो वाम दलों ने 34 साल और अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सत्ता में 10 साल पूरे कर लिए हैं. बंगाल के चुनावी अतीत को देखते हुए टीएमसी का जीत की हैट्रिक लगाने का दावा गैरवाजिब भी नहीं लगता, लेकिन दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के लिए चुनावी राह आसान भी नहीं नजर आ रही. इस बार तस्वीर साल 2016 के विधानसभा चुनाव से काफी अलग नजर आ रही है. इस बार टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी चक्रव्यूह में घिरी हैं. हालात की गंभीरता का अंदाजा उन्हें भी है, तभी तो दूसरे चरण के मतदान से एक दिन पहले उन्होंने 15 नेताओं को चिट्ठी लिखकर बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की अपील की. दूसरे चरण में 30 सीटों पर मतदान होना है, लेकिन सीएम ममता ने प्रचार के अंतिम दिनों में नंदीग्राम में डेरा डाल दिया जहां से वो खुद चुनाव मैदान में हैं. दीदी जानती हैं कि बंगाल में सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह काफी हद तक सीएम की सीट पर निर्भर करता है. साल 2011 का चुनाव इसका उदाहरण है जब वामो ने सत्ता गंवाई थी, तब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट नहीं बचा पाए थे.
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