
दुनिया के सबसे खतरनाक War Zones और वहां फंसे 20 करोड़ बच्चों के दर्द की अंतहीन दास्तां...
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यूक्रेन, सूडान, सीरिया, यमन, नाइजीरिया, कॉन्गो, अफगानिस्तान... ये आज के वक्त में देशों के नाम नहीं वॉर जोन्स के नाम हैं जहां फंसे लोगों की जिंदगी बम-गोलों-मिसाइलों, हवाई हमलों और धमाकों के बीच बीत रही है. इन इलाकों में फंसे लाखों-करोड़ों बच्चों-महिलाओं की जिंदगी की त्रासद कहानियां आपको रुला देंगी. तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां हैं लेकिन इन हालात को भयावह होने से रोकने में सब विफल रही हैं.
जंग तो ख़ुद ही एक मसला है, जंग क्या मसलों का हल देगी...
मशहूर लेखक-शायर साहिर लुधियानवी की लिखी ये पंक्तियां दुनिया के आज के हालात को बयां करती हुई एकदम सही साबित होती हैं. इतिहास की या वर्तमान की कोई भी जंग हो वह शासकों के अहंकार, साम्राज्य बढ़ाने की ललक और सैन्य ताकत के अभिमान को लेकर शुरू होती है लेकिन आम लोगों की जिंदगी पर उसका क्या असर होता है इस पर अगर गौर किया जाए तो दुनिया की एक अलग ही तस्वीर नजर आती है.
आज रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते हुए 9 महीने हो गए हैं, अफगानिस्तान में तालिबान शासन के जुल्म जारी हैं, सीरिया-इराक-यमन, आर्मीनिया-अजरबैजान जैसे वॉर जोन या माली, सूडान, कॉन्गो, सोमालिया, नाइजीरिया, कैमरून समेत दुनिया के कई हिस्सों में Conflict zone खुले हुए हैं. हजारों-लाखों लोगों की मौतें हो रही हैं तो उनसे भी कई गुना ज्यादा लोग गोलीबारी-बमबारी, मिसाइल अटैक और हवाई हमलों में विकलांग तक हो जा रहे हैं. लाखों लोगों के घर-बार तबाह हो रहे हैं और लोग विस्थापित हो रहे हैं. शहर के शहर और कस्बे-गांव तबाह हो रहे हैं. स्कूलों पर, अस्पतालों पर बमबारी, हवाई हमले और मिसाइल अटैक हो रहे हैं.
मानवीय संकट कितना बड़ा? जंग में उलझा देश कोई भी हो, दुनिया का इलाका कोई भी हो लेकिन इस तबाही के बीच सबसे बुरा हाल महिलाओं और बच्चों का है. UNICEF के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध-लैंडमाइन ब्लास्ट, हवाई हमलों और विस्फोटों में मारे गए कुल लोगों में से आधे बच्चे होते हैं. UNICEF के डेटा के अनुसार आज दुनिया के सबसे खतरनाक वॉर जोन्स में 20 करोड़ बच्चे घिरे हुए हैं, जबकि क्लाईमेट चेंज-आतंकवाद जैसी बाकी समस्याओं को भी मिला लें तो 42 करोड़ से अधिक बच्चे Conflict zones में त्रासदी जैसी जिंदगी जी रहे हैं. यानी दुनिया के हर 6 में से 1 बच्चा कंफ्लिक्ट जोन में जी रहा है.
उनके पास न तो कोई सुविधा है, न कोई फ्यूचर... इन संकटग्रस्त इलाकों में सिर्फ किशोरवय बच्चियां ही 9 करोड़ से अधिक हैं. जिनकी उम्र 10 से 17 साल के बीच है. उनकी जिंदगी में जंग-आतंकवाद की समस्याओं ने केवल बेबसी, विस्थापन और शरणार्थी जीवन का अंधियारा भर दिया है. इन वॉर जोन में न तो बाल अधिकारों का कोई संरक्षण है, न मानवाधिकार के पालन का कोई सिस्टम है. यहां शोषण, भुखमरी, चाइल्ड ट्रैफिकिंग और अत्याचार का सामना इन करोड़ों बच्चों को करना पड़ रहा है. यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार इन कंफ्लिक्ट जोन में रोजाना बच्चों के खिलाफ अत्याचार-शोषण के 65 मामले दर्ज होते हैं, और ऐसे मामले हजारों नहीं लाखों की संख्या में हैं. न जाने इससे कितना गुना ज्यादा हिंसा और अत्याचार के मामले बिना दर्ज हुए रह जाते हैं. इस हालात से इन इलाकों में फंसे बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर हो रहा है.
यूक्रेन के हालात पहले कोरोना महामारी ने दो साल तक तबाही मचाई और उसके बाद यूक्रेन में जारी जंग के बीच बच्चों पर अत्याचार, ह्यूमैन ट्रैफिकिंग, शारीरिक अंगों की अवैध तस्करी, बंधुआ मजदूरी, शोषण, रेप, बाल विवाह समेत कई शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं. खासकर यूक्रेन के उन इलाकों में जहां रुसी सैनिकों का कब्जा हो गया. यूएन की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध छिड़ने के एक महीने के भीतर ही यूक्रेन के आधे से अधिक बच्चों को विस्थापन झेलना पड़ा. बड़ी संख्या में बच्चे मिसाइल और हवाई हमलों के शिकार बने और जो लोग पौलैंड जैसे पड़ोसी देशों में जान बचाने के लिए पहुंचे भी उन्हें और उनके बच्चों को शरणार्थी शिविरों में कैद होकर रह जाना पड़ा है. यूक्रेन में ह्यूमैन राइट एजेंसी ने बच्चों पर अत्याचार और शोषण के कई मामले दर्ज किए. एजेंसी ने रूसी सेना पर अवैध रूप से यूक्रेनी लोगों को बंधक बनाकर रूसी इलाके में ले जाने का आरोप भी लगाया. यूक्रेन के वॉर जोन से बच्चों पर अत्याचार की कई रिपोर्टें स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में सामने आई.

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