
तख्तापलट के बाद भी मुश्किल है सीरिया में लोकतंत्र आना, वो देश जहां तानाशाही के खात्मे के बाद बढ़ी राजनैतिक अस्थिरता
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राष्ट्रपति बशर अल-असद के देश छोड़ने के साथ ही सीरिया में दशकों की तानाशाही तो खत्म हो गई, लेकिन लोकतंत्र का रास्ता आसान नहीं. फिलहाल देश की लीडरशिप इस्लामिक गुट हयात तहरीर अल-शाम के पास है. यह एक चरमपंथी समूह है, जो किसी वक्त पर अलकायदा से जुड़ा रहा. इसी से अंदाजा लग सकता है कि सीरिया एक मुश्किल से बचकर दूसरी मुसीबत में जा सकता है. ऐसा कई और देशों के साथ हो चुका.
तख्तापलट के बाद सीरिया की हालत फिलहाल खाली पड़ी जमीन की तरह हो चुकी है, जिसपर हर कोई अपना हक जताना, या अपनी मर्जी बरतना चाहता है. हाल में वहां के कट्टरपंथी नेता अहमद अल-शरा की एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें वे महिला से सिर ढंकने को कह रहे हैं. इसके बाद से तमाम दुनिया में अनुमान लग रहे हैं कि असद परिवार की तानाशाही से छूटकर सीरिया इस्लामिक चरमपंथ के हाथ में पड़ने जा रहा है. अगर ऐसा न हुआ तो भी इसकी संभावना कम है कि इस देश में जल्द लोकतंत्र आ सके. कई देशों का पैटर्न यही बताता है कि देश का राजनैतिक भविष्य अभी अस्थिर ही रहेगा.
अरब स्प्रिंग के दौरान साल 2011 में लीबिया में विद्रोही समूहों ने तत्कालीन तानाशाह मुअम्मर अल गद्दाफी की सरकार को गिरा दिया. कर्नल गद्दाफी 40 से ज्यादा सालों से देश चला रहे थे. उन्हें हटाने के लिए मिलिटेंट गुट एक अंब्रेला के नीचे आए, जिसे नाम दिया- नेशनल ट्रांजिशन काउंसिल. तब लगा था कि देश बदलने वाला है, हालांकि इस घटना को तेरह साल बीत चुके लेकिन लीबिया अब भी अस्थिर है. पहले एकजुट हुए मिलिटेंट समूह अब छिटक चुके. हर कोई सत्ता पाना चाहता है. ये पहली नजर में घरेलू लड़ाई-झगड़े की तरह लगता है लेकिन ये वॉर ट्रैप है, यानी एक युद्ध से निकले लोग, फिर लगातार खुद ही युद्ध में उलझते चले जाते हैं.
अब बात करते हैं सूडान की, जो राजनैतिक उठापटक का क्लासिक उदाहरण है. यहां साल 2019 में तीस सालों से ज्यादा राज कर चुके राष्ट्रपति उमर अल-बशीर की सरकार गिराई गई. लेकिन इसके बाद देश स्थिर नहीं, बल्कि बदहाल ही हुआ. पिछले साल अप्रैल में ये तस्वीर ज्यादा डरावनी हो गई, जब दो सैन्य गुटों के जनरल ही आपस में भिड़ गए. सूडानी सेना और अर्धसैनिक बल के कमांडर जनरल के बीच शुरू जंग सत्ता को लेकर थी.
जैसा कि आमतौर पर होता है ये लड़ाई-भिड़ाई एक समय के बाद रुक जाती, जब दोनों के पास हथियार या बाकी रिसोर्सेज कम पड़ने लगते. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यहां-वहां के उकसावे पर लड़ाई पांच साल बाद भी जारी है.
वेनेजुएला में कई साल बीतने के बाद भी तानाशाही से लोकतंत्र की तरफ ट्रांजिशन हो ही रहा है. साल 2019 में यहां तत्कालीन लीडर निकोलस मादुरो की सरकार हटाने की असफल कोशिश हुई. मादुरो इसके बाद भी सत्ता में बने रहे. इसी जुलाई 2024 को हुए राष्ट्रपति चुनाव में निकोलस मादुरो ने खुद को एक बार और चुनकर आया बता दिया, जबकि विपक्ष इसे सरासर गलत बता रहा है. यहां तक कि यूरोपियन यूनियन ने भी इसमें दखल देते हुए विपक्षी नेता को देश का लोकतांत्रिक रिप्रेजेंटेटिव बता दिया. कुल मिलाकर यहां स्थिति डांवाडोल ही है.

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