
जिस बेटे के लिए दांव पर लगाया सब कुछ, उसी की खातिर दे दी जान... रुला देगी बुजुर्ग मां-बाप की ये दुखभरी दास्तां
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66 साल के चुन्नी भाई गेडिया और 64 साल की मुक्ताबेन गेडिया ने चार मई की रात एक साथ खुदकुशी कर ली. वो भी अपने ही कमरे में पंखे से झूल कर. पर खुदकुशी करने से पहले पूरी तसल्ली से उन्होंने पांच पन्नों का एक खत लिखा. जो उन दोनों की मौत के बाद सुसाइड नोट बन गया.
किसी एक झूठ से पत्ता हटाकर, हमारा सच बहुत रोया था उस दिन.
सूरत के एक मां-बाप उस दिन अपनी जिंदगी का आखिरी खत लिख रहे थे. वो खत भले ही कनाडा में रहने वाले उनके बेटे के नाम था. लेकिन उस खत का पैगाम हर मां-बाप के नाम था. और इसीलिए ज़रूरी था कि वो इस आखिरी खत में हर झूठ से पर्दा हटा दें. और उन्होंने वहीं किया. ये कहानी हर मां-बाप के लिए जानना ज़रूरी है.
सुसाइड नोट बन गया वसीयत उस अर्थी या जनाज़े को पूरे शहर भर का भी कांधा मिल जाए, तो भी तब तक उसकी आत्मा या रूह को सुकून नहीं मिलता, जब तक उन कांधों में उनके अपने बच्चों के कांधे भी शामिल ना हों. कहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा बोझ बुजुर्ग बाप के कांधे पर जवान बेटे की अर्थी होती है. लेकिन उसे क्या कहेंगे, जब बुजुर्ग बाप की अर्थी पर जवान बेटे का कांधा ही ना हो! कांधा हो भी तो फिर उसे क्या कहिएगा जब ख़ुद बुजुर्ग मां-बाप अपनी मौत से पहले ही ये ऐलान कर दें कि उन्हें अपनी अर्थी या जनाज़े पर अपने बच्चों के कांधे नहीं चाहिए. सोचिए न, वो कैसे और किस कदर मजबूर मां बाप होंगे, जो मौत से गले लगाने से पहले सुसाइड नोट को वसीयत बना कर ये वसीयत करते होंगे कि जब वो मर जाएं, तो उनके बच्चे उनके अंतिम संस्कार में शामिल ना हों. उनके अंतिम संस्कार पर उतने ही पैसे खर्च किए जाएं जिसमें आख़िरी रस्में इजाजत देती हैं.
विदेश जाकर भूल जाते हैं रिश्ते नाते अजीब इत्तेफाक है कि इसी हफ्ते इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन ने विश्व प्रवासियों पर अपनी एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अपने-अपने देशों में प्रवासियों की भेजी कमाई के मामले में भारत पूरी दुनिया में अव्वल नंबर पर है. 2024 में जारी 2022 की इस रिपोर्ट के मुताबिक इस एक साल में प्रवासी भारतीयों ने सबसे ज्यादा 111 अरब डॉलर भारत भेजे. कितनी खुशी की बात है ना कि विदेश जाकर भी बच्चे अपने मां-बाप, भाई बहन को पैसे भेज रहे हैं. पर अफसोस सिर्फ पैसे ही भेज रहे हैं. नौकरी, तरक्की, दौलत, स्टेटस और अपनी फैमिली यानी बस अपनी पत्नी और बच्चे इन सबने मिल कर बाकी सारे रिश्ते नाते और जज्बातों को निगल लिया है.
मां-बाप के लिए औलाद के पास वक्त नहीं! घर से पहले ही दूर जा चुके ऐसे बच्चे सचमुच इतने दूर हो चुके हैं कि अब उनके पास अपने बुजुर्ग मां बाप की अर्थियों को कांधा या उनका अंतिम संस्कार करने तक के लिए वक़्त नहीं है. क्या करें? नौकरी ही ऐसी है. विदेशों में नौकरी करना कोई आसान थोड़ी होता है! बड़ी मुश्किल से तो नौकरी मिली है. अंतिम संस्कार के लिए छुट्टी भी नहीं मिलेगी. एक काम करो किसी एनजीओ-वेनजीओ से अंतिम संस्कार करवा दो. जो खर्चा आएगा, हम भिजवा देंगे. कभी मुंबई से, कभी दिल्ली से, कभी कानपुर से, कभी आगरा से तो कभी किसी नए शहर से अक्सर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन जैसे देशों में रहने वाले कामयाब बच्चों के अपने बुजुर्ग मां बाप की मौत की खबर सुनने के बाद कुछ ऐसे ही रिएक्शन होते हैं.
गेडिया दंपत्ति की दुखभरी दास्तान ये 66 साल के चुन्नी भाई गेडिया और 64 साल की मुक्ताबेन गेडिया हैं. चार मई की रात दोनों ने खुदकुशी कर ली. अपने ही कमरे में पंखे से झूल कर. पर खुदकुशी करने से पहले पूरी तसल्ली से पांच पन्नों का एक खत लिखा. दोनों जैसे ही मरे ये खत सुसाइड नोट बन गया. इन दोनों का भी एक बेटा है पीयूष. इन्हीं मां-बाप ने क्या-क्या तकलीफें उठा कर किस किस से कर्ज लेकर चार साल पहले इस उम्मीद से अपने बेटे को कनाडा भेजा कि वो वहां कमाएगा और फिर सारे कर्ज उतार देगा. पर अफसोस. बाकी कर्ज तो छोड़िए ये तो अपने बूढ़े मां-बाप के अंतिम संस्कार का कर्ज भी अब कभी नहीं उतार पाएगा. उतार भी नहीं सकता क्योंकि खुद मां -बाप ने अपने आखिरी खत में उससे वो कर्ज उतारने का हक भी छीन लिया.

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