
जंग लंबी खिंची तो अमेरिका और ईरान के लिए इसे ख़त्म करना मुश्किल क्यों होता जाएगा
BBC
ईरान पीछे हटने के कोई संकेत नहीं दे रहा है, तो क्या सिर्फ़ हवाई ताक़त के ज़रिये अमेरिका अपना मुख्य लक्ष्य हासिल कर सकता है.
पिछले कई हफ्तों से अमेरिका और इसराइल इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता को बेहद कमज़ोर कर दिया गया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बार-बार यह दावा किया है कि लगातार किए गए हमलों ने ईरान की कमांड संरचना को पंगु बना दिया है और जवाबी कार्रवाई करने की उसकी क्षमता को कमज़ोर कर दिया है.
उनके हिसाब से तो इस संघर्ष को अब अंत की ओर बढ़ जाना चाहिए था.
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे उलट दिखाई देती है. तनाव कम होने के बजाय और तेज़ और ज़्यादा तीखा होता जा रहा है और बाहर निकलने के साफ़ रास्ते कम होते जा रहे हैं.
शनिवार को पता चला कि ईरान ने हिंद महासागर में स्थित अमेरिका-ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया की ओर दो मिसाइलें दागी थीं, जिसकी दूरी लगभग 3,800 किलोमीटर है. हालांकि ये मिसाइलें द्वीप तक नहीं पहुंच पाईं, लेकिन इस घटना ने ईरान की क्षमताओं को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं. अब तक आम तौर पर माना जाता रहा था कि उसकी मिसाइलों की मारक दूरी लगभग 2,000 किलोमीटर तक ही है.
चाहे यह कोई पहले से छुपी हुई क्षमता हो या फिर बमबारी के दौरान विकसित की गई क्षमता- नतीजा एक ही है: सैन्य दबाव ईरान की प्रगति को रोक नहीं पाया है.
अगर वाकई ईरान के राजनीतिक नेतृत्व के बड़े हिस्से को ख़त्म कर दिया गया है- जिसमें सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई, अली लारिजानी जैसे वरिष्ठ नेता, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर, सशस्त्र बलों के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ और प्रमुख मिसाइल निर्माण ठिकानों का नष्ट होना शामिल है- तो फिर यह अभियान चला कौन रहा है? और इतना भारी दबाव झेलने के बावजूद ईरान अपनी क्षमताएं कैसे बनाए हुए है?













