
क्या है रिफ्यूजी कन्वेंशन, जिसके हवाले से केंद्र ने रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने से मना कर दिया?
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देश में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA) लागू होते ही रोहिंग्या मुसलमानों पर अलग बहस छिड़ चुकी. सेंटर ने एक याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अवैध ढंग से आए रोहिंग्याओं को अगर रुकने दिया जाए तो देश की सुरक्षा खतरे में आ सकती है. साथ ही यह भी कहा कि हमारे यहां अलग से रिफ्यूजी एक्ट नहीं है, जो हमें किसी को शरणार्थी मानने पर बाध्य कर सके.
अवैध रोहिंग्याओं को वापस उनके देश म्यांमार भेजने की शुरुआत मणिपुर से हो चुकी है. साथ ही घुसपैठ कर चुके इन लोगों की पहचान भी हो रही है ताकि सबको डिटेंशन सेंटर से होते हुए वापस लौटाया जा सके. ये सब तब हो रहा है, जब हम सीएए के तहत 3 पड़ोसी देशों की 6 माइनोरिटीज को अपना नागरिक बनाने जा रहे हैं. इनमें मुस्लिम शामिल नहीं. इसी बीच सुप्रीम कोर्ट और सेंटर के बीच रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा देने पर ठन गई.
केंद्र ने क्यों दिया कोर्ट को जवाब
असल में कोर्ट में एक याचिका डाली गई, जिसमें रोहिंग्याओं के पक्ष में गुहार लगाते हुए कहा गया कि उन्हें डिटेंशन सेंटरों से आजाद कर दिया जाए. बता दें कि फॉरेनर्स एक्ट तोड़ने के आरोप में ये समुदाय सेंटरों में रखा गया है. इसी याचिका का जवाब देते हुए सेंटर ने साफ कर दिया कि अवैध ढंग से देश के भीतर आए लोग घुसपैठिए हैं, न कि शरणार्थी.
सेंटर के दूसरे तर्क भी थे. न केवल रोहिंग्या मुस्लिमों ने एक्ट तोड़ा, बल्कि उनके बिना दस्तावेजों का रहना खतरनाक है. लगातार कई रास्तों से वे भीतर आ सकते हैं, जो कि नेशनल सिक्योरिटी के लिए ठीक नहीं.
एक दलील और भी है. केंद्र ने कहा कि हमारे यहां खुद ही आबादी ज्यादा है, और रिसोर्स सीमित. ऐसे में अपने नागरिकों की देखभाल पहले जरूरी है. अगर और लोगों को नागरिकता या शरण दी जाए तो असल नागरिक प्रभावित होंगे.

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