
कलकत्ता हाईकोर्ट के वकीलों को राहत, गर्मी में नहीं पहनना पड़ेगा गाउन
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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हाई कोर्ट के वकीलों को राहत देते हुए अदालत ने उन्हें गर्मी में गाउन पहनने से छूट दे दी है. यह फैसला वकीलों की उस अपील के बाद लिया गया है, जिसमें उन्होंने हीटवेव और भीषण गर्मी को देखते हुए कोई ठोस कदम उठाने का अनुरोध किया था.
भीषण गर्मी को देखते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट वकीलों को राहत देने की पहल की है. हाईकोर्ट ने गर्मी की छुट्टी तक वकीलों को गाउन पहनने से छूट दे दी है. कई अधिवक्ताओं ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से हीटवेव की स्थिति को देखते हुए कुछ कदम उठाने का अनुरोध किया था. इसके बाद ये फैसला लिया गया है. दरअसल, वकीलों का काला कोट (गाउन) औपनिवेशिक काल से चला आ रहे है. इसके पीछे का उद्देश्य कोर्ट की गरिमा को बनाए रखना है.
साल 2022 में SC में गया था मामला
गर्मी के दिनों में अदालतों में वकीलों के लिए काला कोट पहनना एक मुश्किल भरा काम होता है. इसे लेकर पहले भी अदालतों में याचिकाएं दायर की जा चुकी गई हैं. हालांकि वकीलों को कुछ जगहों पर कुछ राहत मिली तो कई बार उन्हें याचिकाएं वापस भी लेनी पड़ीं. ऐसा ही मामला साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट में गया था. जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. याचिका में कहा गया था कि गर्मी के दिनों में वकीलों के लिए काला कोट और गाउन पहनना अनिवार्य न रखा जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने गर्मी के दिनों में वकीलों के लिए काला कोट और गाउन पहनना अनिवार्य न रखने की मांग पर सुनवाई से इंकार कर दिया था. कोर्ट की ओर से याचिकाकर्ता को सलाह दी गई थी कि वह वकीलों के ड्रेस कोड समेत दूसरे नियमों को तय करने वाली संस्था 'बार काउंसिल आफ इंडिया' में अपनी बात रखें.
याचिका में दिए गए थे ये तर्क
याचिका में कहा गया है कि वकीलों के लिए मौजूदा ड्रेस कोड लंबे समय पहले निर्धारित की गई जो मौसम के अनुसार नहीं हैं. विशेषकर उत्तरी और तटीय इलाकों के मौसम के अनुकूल यह ड्रेस कोड नहीं है. याचिकाकर्ता शैलेंद्र त्रिपाठी ने कहा था कि काला कोट और गाउन औपनिवेशिक काल से चले आ रहे हैं. यह सही है कि इसके पीछे उद्देश्य वकालत के व्यवसाय और कोर्ट की गरिमा को बनाए रखना है. लेकिन व्यवहारिक पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए. उनका तर्क था कि भारत के अधिकतर हिस्सों में पड़ने वाली भीषण गर्मी में इस ड्रेस कोड का पालन कष्टदायक है. साथ ही, नए और आर्थिक रूप से कम सक्षम वकीलों के लिए इस तरह की पोशाक का प्रबंध कठिन होता है.
बेंच ने की थी ये टिप्पणी

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