
ईरान का युद्ध में फंसे रहना क्या रूस की आर्थिक मुश्किलों को दूर कर पाएगा?
BBC
युद्ध शुरू होने के बाद से रूसी तेल 'यूराल्स' की क़ीमत 70 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ चुकी है. भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने वाले यूराल्स की क़ीमत अब 98 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई है.
रूस के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी और अमेरिका द्वारा रूसी ऊर्जा निर्यातकों पर लगाए गए प्रतिबंधों में अस्थायी ढील से रूस को ज़्यादा कमाई करने का मौक़ा मिलेगा. इसका सीधा मतलब यह है कि देश के बजट की आमदनी बढ़ेगी.
पिछले कुछ महीनों से रूस आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका और इसराइल का ईरान के साथ युद्ध रूस की इन समस्याओं को हल कर सकता है? इस सवाल का जवाब काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि मध्य पूर्व में यह युद्ध किस दिशा में जाता है और तेल की ऊंची क़ीमतों का दौर कितने समय तक बना रहता है.
युद्ध के पहले हफ़्ते में बाज़ार काफ़ी हद तक शांत नज़र आया. क़ीमतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं, लेकिन न तो बाज़ार में घबराहट दिखी और न ही क़ीमतों में कोई अचानक उछाल आया. ज़्यादातर विश्लेषकों को उम्मीद थी कि यह युद्ध जल्दी ख़त्म हो जाएगा.
लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया, इस टकराव के लंबे समय तक चलने की आशंका भी बढ़ती गई. इसी बीच दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापारिक रास्तों में से एक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संभावित रुकावट की चिंता ने हालात को और गंभीर बना दिया.
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विश्लेषण एजेंसी 'आर्गस' ने बीबीसी से बातचीत में बताया है कि रूसी तेल 'यूराल्स' की क़ीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है. युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक इसकी क़ीमत 70 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ चुकी है.
रूस से भारत भेजे जाने वाले तेल की खेपों की क़ीमतों में सबसे ज़्यादा उछाल देखा गया है. भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने वाले रूसी कच्चे तेल 'यूराल्स' की क़ीमत अब 98 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई है.













