
आबादी ज्यादा, फिर भी कनाडा में क्यों नहीं बढ़ सका हिंदुओं का राजनैतिक कद? दो साल में मंदिरों पर 20 से ज्यादा हमले, बढ़ा हेट क्राइम
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कनाडा में मंदिर पर खालिस्तान समर्थकों के हमले ने एक बार फिर कनाडाई सिख-हिंदू विवाद को हवा दे दी. इससे पहले भी कई मौकों पर अलगाववादी मंदिरों पर हमले करते रहे. अब ये बात भी उठ रही है कि सिखों से बड़ी आबादी होने के बाद भी क्यों वहां के हिंदू हाशिए पर हैं. क्यों बड़ा वोट बैंक होने के बावजूद उन्हें राजनीति में भी नहीं मिल रही तवज्जो?
कुछ दिनों पहले कनाडा के ब्रैम्पटन के हिंदू सभा मंदिर पर खालिस्तानियों ने हमला किया था. अब उसकी जांच और कार्रवाई जारी है. हिंदू धर्मस्थल पर खालिस्तानी अटैक पहली बार नहीं हुआ. पहले भी कई मौकों पर ऐसा हो चुका. हैरानी की बात ये है कि हमलावर को रोकने में कनाडा प्रशासन की बहुत कोशिश नजर नहीं आती. यहां तक कि परदे की ओट में वहां की पुलिस और व्यवस्था खालिस्तानियों को सपोर्ट करती दिखती है.
अगर वहां बसी सिख आबादी वोट वहां के लिए वोट बैंक है, तो हिंदू जनसंख्या तो और भी ज्यादा है. फिर क्या वजह है जो कनाडा में हिंदुओं की उतनी पकड़ नहीं?
कितने हिंदू और सिख हैं वहां साल 2021 की जनगणना के अनुसार कनाडा की आबादी लगभग पौने चार करोड़ है. इनमें सिख आबादी करीब पौने आठ लाख है, जबकि हिंदू साढ़े आठ लाख के आसपास होंगे. पिछले कुछ सालों में कनाडा में दोनों ही धर्मों के भारतीय काफी तेजी से बढ़े. हालांकि सिख लगातार बढ़त बनाए हुए हैं.
पंजाबी संसद में तीसरी बड़ी भाषा
कनाडा में अंग्रेजी, फ्रेंच और मेंडेरिन के बाद पंजाबी चौथी सबसे लोकप्रिय भाषा है. साल 2016 से अगले पांच सालों के भीतर पंजाबी बोलने वालों में 49 फीसदी बढ़त हुई. ये मेंडेरिन से कहीं ज्यादा है, जिसे बोलने वाले केवल 15 प्रतिशत बढ़े. ये तो हुई आम लोगों की बात, लेकिन पंजाबी की ताकत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वहां की संसद में अंग्रेजी और फ्रेंच के बाद पंजाबी तीसरी भाषा है.
वहीं हिंदी बहुत से लोग बोलते तो हैं, लेकिन भाषा के पायदान पर इसे अभी कोई बढ़त नहीं मिल सकी. कनाडा के कुछ बड़े शहरों, जैसे टोरंटो, वैंकूवर और मॉन्ट्रिअल में हिंदी भाषी काफी हैं. ये वो इलाके हैं, जहां इमिग्रेंट्स रहते हैं, लेकिन ये वहीं तक सीमित है. दूसरी तरफ पंजाबी भाषा और स्क्रिप्ट सिखाने के लिए वहां कई संस्थान हैं.

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