
Delhi: असली बारिश से कितनी अलग होती है क्लाउड सीडिंग वाली आर्टिफिशियल रेन...गड़बड़ हुई तो क्या होगा?
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दिल्ली के प्रदूषण से निपटने के लिए क्लाउड सीडिंग से आर्टिफिशियल बारिश होने वाली है. सामान्य बारिश से अलग – ये बादलों में रसायन डालकर 5-15% ज्यादा बरसाती है, छोटी लेकिन टारगेटेड होती है. ₹3.21 करोड़ का ट्रायल, 90 मिनट की उड़ान से 100 वर्ग किमी कवर होगा. गड़बड़ी का भी चांस है.
दिल्ली की हवा हर साल सर्दियों में जहरीली हो जाती है. दिवाली के बाद धुंध इतनी गाढ़ी हो जाती है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है. इसी समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार आर्टिफिशियल बारिश की कोशिश कर रही है. इसे क्लाउड सीडिंग कहते हैं. ये तकनीक बादलों में रसायन डालकर बारिश कराती है. लेकिन ये सामान्य बारिश से बिल्कुल अलग है.
क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तरीका है, जिसमें मौजूद बादलों में खास रसायन डाले जाते हैं ताकि बारिश हो जाए. ये रसायन पानी की बूंदों या बर्फ के कणों को जोड़ने में मदद करते हैं. मुख्य रसायन हैं सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस (ठंडा कार्बन डाइऑक्साइड) या नमक (जैसे आयोडाइज्ड सॉल्ट).
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ये तरीका 1940 के दशक से इस्तेमाल हो रहा है. अमेरिका, चीन और यूएई जैसे देश पानी की कमी या प्रदूषण कम करने के लिए करते हैं. दिल्ली में ये हवा साफ करने के लिए है. परियोजना का नाम है 'टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन एंड इवैल्यूएशन ऑफ क्लाउड सीडिंग फॉर दिल्ली एनसीआर पॉल्यूशन मिटिगेशन. इसकी लागत ₹3.21 करोड़ है.
सामान्य बारिश प्रकृति का कमाल है. बादल बनते हैं, हवा ठंडी होती है, नमी जमा होकर बूंदें बनाती हैं और बरस पड़ती हैं. ये प्रक्रिया बिना किसी मदद के चलती है. लेकिन क्लाउड सीडिंग में इंसान हस्तक्षेप करता है. मुख्य फर्क ये हैं...

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