
सावरकर के फ़्रांस में पानी के जहाज़ से भागने और पकड़े जाने की कहानी
BBC
फ़्रांस में ब्रिटिश क़ैद से भागने की सावरकर की कोशिश नाकाम रही जिसके बाद उन्हें भारत लाया गया और अंडमान की जेल भेज दिया गया. उन्हें 25-25 साल जेल की दो सज़ाएं सुनाई गई थीं.
एक जुलाई, 1909 को सावरकर से प्रभावित और अक्सर लंदन के इंडिया हाउस आने वाले मदनलाल ढींगरा ने भारतीय मामलों के मंत्री के सहयोगी कर्ज़न विली को गोली मार दी.
ब्रिटिश सरकार विली की हत्या में सावरकर की भूमिका को तो सिद्ध नहीं कर पाई लेकिन उसे ये अंदाज़ा ज़रूर हो गया कि मदनलाल और सावरकर में गहरी दोस्ती है और सावरकर ने ही ढींगरा के बेगुनाह होने की याचिका तैयार की थी.
जब मजिस्ट्रेट की अदालत में ढींगरा को उनका बयान नहीं पढ़ने दिया गया तो सावरकर ने ही उसे एक ब्रिटिश पत्रकार की मदद से लंदन के एक अख़बार में प्रकाशित करवाया था.
मदनलाल ढींगरा पर मुक़दमा चला और डेढ़ महीने के अंदर ही उन्हें 17 अगस्त, 1909 को फाँसी दे दी गई लेकिन इस बीच नासिक में ब्रिटिश कलेक्टर आर्थर जैकसन की हत्या में सावरकर का नाम आने की वजह से लंदन में उनकी मुश्किलें बढ़ गई थीं.
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सावरकर को इस बात का अंदेशा था कि उन्हें जल्द ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा इसलिए वो लंदन से पेरिस चले गए थे. जब वो मार्च 1910 में लंदन वापस लौटे तो उन्हें विक्टोरिया स्टेशन से बाहर निकलते ही गिरफ़्तार कर लिया गया था.
नीलांजन मुखोपाध्याय अपनी किताब 'आरएसएस, आइकंस ऑफ़ द इंडियन राइट' में लिखते हैं, "शुरू में अंग्रेज़ों ने इस बात पर विचार किया कि क्या सावरकर पर लंदन में मुक़दमा चलाया जाए या भारत में? मुद्दा ये था कि अपराध नासिक में किया गया था जबकि सावरकर उस समय इंग्लैंड में रह रहे थे."













