
राजगुरु की कहानी जिन्हें दी गई थी सुखदेव और भगत सिंह के साथ फांसी - विवेचना
BBC
चंद्रशेखर आज़ाद ने राजगुरु को ओरछा के जंगलों में पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग दी थी और उनका निशाना काफ़ी सटीक था. राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी.
शिवराम हरि राजगुरु को बचपन से ही तैराकी, तीरंदाज़ी और कुश्ती का शौक था. गुलेल का उनका निशाना भी पक्का था. बाद में उन्होंने पिस्टल चलानी भी सीख ली थी और कहा जाता है कि स्वतंत्रता सेनानियों में चंद्रशेखर आज़ाद के बाद राजगुरु का निशाना सबसे अच्छा था.
बनारस में संयोग से उनकी मुलाकात स्वतंत्रता सेनानी विश्वनाथ वैशम्पायन से हुई. उन्होंने राजगुरु को चंद्रशेखर आज़ाद से कानपुर में मिलवाया.
अनिल वर्मा अपनी किताब 'राजगुरु द इंविंसिबिल रिवोल्यूशनरी' में इस मुलाकात का दिलचस्प विवरण देते हुए लिखते हैं, "आज़ाद ने राजगुरु से पूछा, 'तो तुम क्रांतिकारी बनना चाहते हो?'"
राजगुरु ने जवाब दिया. ''जी हाँ. मैं इस दिशा में काफ़ी कोशिश करता रहा हूँ.''
आज़ाद ने कहा, ''इसके बावजूद कि इसका अंजाम गोलियों से छलनी शरीर, देश निकाला या फाँसी तक हो सकता है ? ''
राजगुरु का जवाब था, ''मुझे इसका अंदाज़ा है लेकिन मैं इससे भयभीत नहीं हूँ.''
आज़ाद ने फिर सवाल किया, ''तुम्हारे क्या-क्या गुण हैं ?''













