
मुसलमान और आप्रवासी मुद्दे के सहारे असम से आगे की राजनीति साध रहे हैं हिमंता?
BBC
हिमंता ने अपने पांच साल के कार्यकाल में कई ऐसे बयान दिए या फ़ैसले लिए, जिन्हें विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक अल्पसंख्यक विरोधी मानते हैं.
''हमारी मुसलमानों से क्या दिक्कत हो सकती है. भारत एक सेक्युलर राष्ट्र है. सभी को एक जैसे अधिकार हैं. असम का जंग मुसलमान के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि बांग्लादेशी मुसलमान के ख़िलाफ़ है.''
हाल ही में एक निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम में ये बातें असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहीं. हिमंता से पूछा गया था कि उन्हें मुसलमानों से क्या दिक्कत है? जवाब में वह कहते हैं कि उनकी परेशानी मियां मुसलमानों से है, असम के स्वदेशी मुसलमानों से नहीं.
उन्होंने कहा, ''मेरी गाड़ी का ड्राइवर बीते 30 सालों से एक मुसलमान बेटा ही है. मेरे कार्यालय में 30 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं. हमें दिक्कत है जब बांग्लादेशियों की बात आती है. इसलिए जब सवाल करें तो मियां मुसलमान और मुसलमान दोनों को एक ही खांचे में रखकर न पूछें.''
पर यही हिमंता बिस्वा सरमा ने साल 2023 में छत्तीसगढ़ में आयोजित एक रैली में कहा था, ''यह हिंदुओं का देश है और हिंदुओं का ही रहेगा. सेक्युलरिज़्म की भाषा हमें मत सिखाओ''
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तो एक ओर हिमंता खुद को संवैधानिक और सेक्युलर ढांचे के भीतर रखते हुए 'स्वदेशी' और 'बांग्लादेशी' मुसलमानों के बीच के अंतर को रेखांकित करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके कई बयान हिंदुत्व की आक्रामक राजनीति की ओर इशारा करते हैं.
अपने पांच साल के कार्यकाल में हिमंता ने कई ऐसे बयान दिए या फ़ैसले लिए, जिन्हें विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक अल्पसंख्यक विरोधी मानते हैं.













