
ये हैं असल The Railway Man: जिन्होंने नाक-मुंह पर गीला रूमाल बांधकर बचाई थी हजारों जिंदगियां, पढ़ें भोपाल गैस त्रासदी के हीरो की दास्तां
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The Railway Men भले ही भोपाल गैस त्रासदी के गुमनाम नायकों की कहानी बताई जा रही हो, लेकिन अपनी जान पर खेलकर हजारों रेल यात्रियों की जिंदगी बचाने वाला असल हीरो तो गुमनाम ही रह गया...1984 की त्रासदी के नायक के योगदान का दुनिया जहां ने कोई खास जिक्र नहीं किया. अब 39 साल बाद किया भी तो असली नाम देने से ही कन्नी काट ली... यह कहते-कहते शादाब थम से जाते हैं.
2 December 1984 Bhopal Gas Tragedy: ''सच तो यह है कि हम न जान लेने वालों को सजा दिला पाए और न जान बचाने वालों को शाबासी...' ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आई 'The Railway Men' के डायलॉग से भोपाल के कोहेफ़िज़ा में रहने वाले शादाब दस्तगीर काफी इत्तेफाक रखते हैं. लेकिन वेब सीरीज की कहानी और किरदारों को लेकर वह पूरी तरह सहमत नहीं हैं.
करीब 50 साल के शादाब दस्तगीर 1984 में भोपाल रेलवे स्टेशन के डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट रहे दिवंगत गुलाम दस्तगीर के सबसे छोटे बेटे हैं. शादाब का दावा है कि 'द रेलवे मैन: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ भोपाल 1984' में केके मेनन का किरदार पूरी तरह उनके पिता गुलाम दस्तगीर पर ही आधारित है.
1984 की उस काली रात (2-3 दिसंबर) की दास्तां सुनाते हुए शादाब बताते हैं, ''उस साल मैं करीब 13 या 14 साल का था. पुराने भोपाल के एक घर में हमारा पांच सदस्यीय परिवार रहता था. 2 दिसंबर की रात मां के साथ हम घर में तीन भाई थे. करीब 11 बजे पिता गुलाम दस्तगीर भोपाल रेलवे स्टेशन के लिए निकल गए थे. तभी आधी रात को हमारे मोहल्ले में चीख-पुकार मचने लगी. बाहर जाकर देखा तो लोग इधर-उधर भाग रहे थे और एक अजीब-सी गंध नथुनों में घुसी जा रही थी. ऐसा लग रहा था कि मानो किसी ने मिर्ची के गोदाम में आ लगा दी हो या फिर गोभी को बड़े पैमाने पर उबाला जा रहा हो. गंध खतरनाक होती जा रही थी. कुछ समझ आ नहीं रहा था. किसी ने बताया कि ऊंचाई वाले स्थान पर जाकर ही जान बचाई जा सकती है. भागते-हांफते मां और तीनों भाई तमाम लोगों की तरह जेल पहाड़ी पर पहुंचे. लेकिन रातभर पिता की चिंता सताती रही.
भोपाल की हवा में जहरीली गंध थमने के बाद सुबह मां के साथ हम तीनों भाई घर लौटे तो देखा कि पिता अपनी ड्यूटी से वापस नहीं लौटे. अमूमन नाइट ड्यूटी खत्म करने के बाद पिता सुबह करीब 8 या 8:30 तक लौट आते थे. किसी अनहोनी की आशंका के चलते मैं अपने पिता को ढूंढने साइकिल से निकल पड़ा. लेकिन रास्ते का मंजर देख ठिठक गया.
बकौल शादाब, भोपाल की सड़कों पर बेतरतीब बिखरा हुआ सामान, जगह-जगह इंसानों और जानवरों की लाशें ही लाशें पड़ी हुई थीं. दिसंबर में शादियों का सीजन शुरू हो जाता है तो दूल्हे-बाराती और बैंड बाजे वाले तक सड़कों पर मृत पड़े हुए थे. जैसे-तैसे हिम्मत बनाकर मैं स्टेशन परिसर में दाखिल हुआ तो वहां भी कुछ ऐसा ही मंजर दिखा. यात्रियों के बैग, मुंह से झाग उगलते शव और चारों तरफ सन्नाटा. मतलब श्मसान घाट में तब्दील एक स्टेशन और लाशों में तब्दील लोग.
मैं जब अपने पिता की केबिन में घुसता हूं तो एक अंकल (संभवत: रेलवे कर्मचारी) बैठे दिखे. मैंने पतासाजी की तो उन्होंने बताया कि आपके पिता (डिप्टी सुपरिटेंडेंट) की हालत ज्यादा खराब थी और वह बेहोश पड़े हुए थे, तो रिलीफ टीम ने उनको एंबुलेंस से हमीदिया अस्पताल रेफर कर दिया. इसके बाद साइकिल उठाकर मैं हमीदिया पहुंचा तो वहां भी लाशें ही लाशें और जिंदगी-मौत के बीच जंग लड़ रहे लोगों को देख सिहर उठा. डॉक्टरों पर जैसा बन पड़ रहा, वैसा इलाज कर रहे थे, क्योंकि किसी को मालूम नहीं था कि हवा में उड़े जहर का सही इलाज क्या है? अस्पताल परिसर में अपने लोगों को गंवाने वालों का रुदन क्रंदन देख मैं हताश-निराश घर लौट आया.

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