
जानें कैसे काम करती है झूठ पकड़ने की मशीन... जिसका सामना करेगा श्रद्धा का कातिल आफताब
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श्रद्धा मर्डर केस के आरोपी आफताब अमीन पूनावाला का पॉलीग्राफ टेस्ट किसी भी समय हो सकता है. दिल्ली पुलिस को इसकी अनुमति मिल गई है. पॉलीग्राफ टेस्ट को लाई डिटेक्टर टेस्ट भी कहते हैं. आइए जानते हैं कि झूठ पकड़ने वाली मशीन कैसे काम करती है. जिसका सामना आफताब करने वाला है.
Shraddha Murder Case: श्रद्धा वॉल्कर हत्याकांड के आरोपी आफताब अमीन पूनावाला (Aftab Ameen Poonawala) को झूठ पकड़ने वाली मशीन का सामना करना पड़ सकता है. दिल्ली पुलिस को आफताब के पॉलीग्राफिक टेस्ट की मंजूरी मिल गई है. यानी उसे पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) से गुजरना पड़ सकता है. इस टेस्ट को लाई डिटेक्टर मशीन (Lie Detector Machine) टेस्ट भी कहते हैं. झूठ पकड़ने वाली मशीनों या नार्को टेस्ट की अदालत में उतनी महत्ता नहीं है, जितनी कि इस टेस्ट में दी गई जानकारी के आधार पर खोजे गए सबूत हैं. आइए जानते हैं कि कैसे काम करती है झूठ पकड़ने वाली मशीन...
झूठ पकड़ने वाली मशीन यानी लाई डिटेक्टर मशीन को 101 साल पहले जॉन अगस्तस लार्सन ने बनाया था. यानी 1921 में. मकसद था मशीन के जरिए अपराधियों से सच कबूल कराना. हमारे देश में पॉलीग्राफ टेस्ट, नार्को टेस्ट या ऐसे किसी परीक्षण के लिए पहले अदालत से अनुमति लेनी होती है. मामले की गंभीरता के आधार पर कोर्ट इसकी अनुमति देता है.
पॉलीग्राफ टेस्ट हमारे देश में कई आतंकियों, अपराधियों पर सफलतापूर्वक किया जा चुका है. पॉलीग्राफ टेस्ट के बारे में सबसे पहले 1730 में एक ब्रिटिश उपन्यासकार डैनियलडिफो ने एक लेख में लिखा था. 1878 में इस कहानी में जिक्र किए गए पॉलीग्राफ मशीन से मिलता-जुलता यंत्र इटैलियन फिजिशिस्ट एंजेलो मोसो ने बनाया. 1895 में इस मशीन में लोमब्रोसो ने ब्लडप्रेशन नापने की यूनिट जोड़ी. अंततः 1921 में जॉन अगस्तस लार्सन ने इस मशीन को पूरी तरह बनाया.
क्या देखते हैं पॉलीग्राफ टेस्ट में?
पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान यह देखा जाता है कि सवालों के जवाब देते समय क्या इंसान झूठ बोल रहा है या सच. इंसान जब भी झूठ बोलता है, तब उसका हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, बदलता है. पसीना आता है. आंखें इधर-उधर जाती हैं. कई बार पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान हाथ-पैर के मूवमेंट पर भी ध्यान दिया जाता है. हालांकि पॉलीग्राफ मशीन पर टेस्ट के दौरान आमतौर पर चार चीजें देखी जाती हैं.

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