
जब लेफ्ट के विरोध से संकट में आ गई थी UPA सरकार, पढ़ें भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील की कहानी
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने अपने घोषणापत्र में परमाणु हथियार नष्ट करने का वादा किया है. इसे लेकर बवाल खड़ा हो गया है. सीपीएम शुरू से ही परमाणु हथियारों का विरोध करती रही है. मनमोहन सरकार में भी जब अमेरिका के साथ परमाणु समझौता हो रहा था, तब लेफ्ट पार्टियों ने इसका दमदार विरोध किया था.
चुनाव हों और बवाल न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. नया बवाल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के एक चुनावी वादे से खड़ा हो गया. सीपीएम ने अपने घोषणापत्र में सरकार बनने पर 'परमाणु हथियार नष्ट' करने का वादा किया है. सीपीएम विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक का हिस्सा है. और इस पर अब बवाल बढ़ता जा रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनावी वादे को 'खतरनाक' बताया है. पीएम मोदी ने एक रैली में कहा, 'भारत जैसा देश, जिसके दोनों पड़ोसियों के पास परमाणु हथियार हों, क्या उस देश में परमाणु हथियार खत्म करना ठीक होगा?'
बीजेपी के कई नेताओं ने सीपीएम पर चीन के इशारों पर काम करने का आरोप लगाया है. वहीं, विपक्ष ने इससे दूरी बना ली है. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि इन सब बातों का जवाब सीपीएम ही देगी, इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है.
बहरहाल, परमाणु हथियारों को लेकर भारत में लेफ्ट पार्टियों का रवैया हमेशा से ऐसा ही रहा है. मनमोहन सरकार के पहले कार्यकाल में जब भारत और अमेरिका के बीच अहम परमाणु समझौता होने वाला था, तब लेफ्ट पार्टियों ने पहले तो धमकी दी और फिर सरकार से समर्थन वापस ले लिया. बाद में एक किताब में खुलासा हुआ था कि इस समझौते का विरोध लेफ्ट पार्टियों ने इसलिए किया था, क्योंकि चीन ने ऐसा कहा था.
चीन के कहने पर परमाणु समझौते का विरोध!
विदेश सचिव रहे विजय गोखले की दो साल पहले एक किताब आई थी. इसका नाम- 'द लॉन्ग गेमः हाउ द चाइनीज नेगोशिएट विद इंडिया' था.

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