
कॉर्न फ्लेक्स खाएंगे तो नहीं बनाएंगे यौन संबंध... ब्रह्मचर्य को बढ़ावा देने के लिए खोजी गई थी नई डाइट
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ये 19वीं सदी की बात है, जब पश्चिम में आधुनिक और पुरानी सोच के बीच घमासान मचा हुआ था. अगर कोई पुरुष क्लिनिक पहुंचे तो चाहे बीमारी कोई हो, डॉक्टर उससे यौन इच्छाओं से जुड़े सवाल करते. बातचीत का अंत इस बात पर होता कि मरीज को स्पर्मोटोरिया हो चुका, जिसका इलाज ये है कि वो अपने पर्सनल पार्ट्स को कतई न छुए.
उस दौर में कई ऐसे उपकरण निकले, जो पुरुषों को मास्टरबेशन से रोकते. डॉक्टर के क्लिनिक में ही एंटी-मास्टरबेशन डिवाइस मिल जाती, जो आमतौर पर इतनी तकलीफ देती कि मरीज के भीतर यौन इच्छा मर ही जाती. धातु के ये उपकरण निजी अंगों को सख्ती से कवर करके रखा करते, जिसपर स्क्रू भी होता था. ये सबकुछ इतना अजीब और पीड़ा देने वाला होता कि लोग खुद ही यौन भावना को मारने लगे.
यौन संबंध पर अच्छी नहीं थी धारणा असल में तब संतान जन्म के अलावा किसी भी तरह से सेक्स ड्राइव को अच्छा नहीं माना जाता था. डॉक्टरों समेत आम लोग भी मानते कि इससे इंसान नैतिक तौर पर तो गिरता ही है, शरीर भी कमजोर होता जाता है. वो लड़ाइयों का दौर था और ताकत की कमी किसी भी तरह स्वीकार नहीं की जा सकती थी. लिहाजा इसे ठीक करने के लिए तरह-तरह के उपाय सोचे जाने लगे. बता दें कि औरतों में यौन भावना को और बुरी नजर से देखा जाता और उनपर लगाम के लिए भी कई उपाय थे, जो लगभग अमानवीय थे.
यहीं कॉर्न फ्लेक्स की नींव पड़ी अमेरिकी डॉक्टर और हेल्थ एक्टिविस्ट जॉन हार्वे कैलॉग्स ब्रह्मचर्य के कट्टर समर्थक थे. वे मानते थे कि यौन संबंध शरीर, दिमाग और आत्मा को प्रदूषित कर देता है. मास्टरबेशन को वे और बुरा मानते, जिससे संतान तक का जन्म नहीं हो सकता. उन्होंने एक किताब लिखी- Plain Facts for Old and Young. इसमें लिखा था कि मास्टरबेशन से शरीर के जोड़ अकड़ जाते हैं, यहां तक कि इससे मिर्गी जैसी बीमारी तक हो सकती है. बुक में एक-दो नहीं, 39 ऐसी बीमारियों का जिक्र है, जो लेखक के मुताबिक मास्टरबेशन से होती हैं.
रोकने के लिए खोजने लगे नई डाइट डॉक्टर शादीशुदा थे, लेकिन ब्रह्मचर्य पर उनका इतना यकीन था कि अपनी पत्नी से संतान पैदा करने की बजाए उन्होंने बच्चे गोद ले लिए. कॉनफ्लैक्स की खोज भी इन्हीं डॉक्टर की देन थी. उनका पक्का यकीन था कि नाश्ता जितना हल्का होगा, यौन इच्छाएं उतनी ही काबू में रहेंगी. इसी सोच के साथ डॉक्टर ने खाने की हल्की-फुल्की चीजें खोजनी शुरू कीं. पीनट बटर भी इन्हीं की देन रही, लेकिन सबसे बड़ी खोज थी कॉर्नफ्लैक्स. साल 1890 में जॉन हार्वे के भाई विलियम कैलॉग्स ने इसे बाकायदा ब्रांड की तरह खड़ा कर दिया.
इस तरह फैलने लगा बाजार मिशिगन से होते हुए कॉर्न फ्लैक्स अमेरिका और फिर पूरी दुनिया में नाश्ते की टेबल पर पहुंच गया. फ्यूचर मार्केट इनसाइट्स के अनुसार साल 2019 में फ्लैक्स का बाजार 17 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा था, ये ग्राफ अगले 10 सालों में 7 प्रतिशत तक ऊपर जा सकता है. वैसे भारत में भी कॉर्न फ्लैक्स के चाहने वाले कम नहीं, लेकिन एक दिक्कत ये है कि फ्लैक्स को ठंडे दूध में डालकर खाना होता है. इसमें शक्कर पूरी तरह नहीं घुलती और न कोई खास स्वाद आता है. यही वजह है कि यहां कॉर्न फ्लैक्स के साथ-साथ सेरिल के दूसरे बड़े ब्रांड भी आसानी से जम गए. ओट्स भी इन्हें बड़ी टक्कर दे रहा है.
तो क्या कॉर्न फ्लेक्स वाकई संबंध बनाने की इच्छा घटाता है? इसका जवाब देने से पहले ये समझते हैं कि खान-पान से यौन इच्छा का सीधा संबंध है. आप क्या खाते हैं, इससे ये इच्छा बढ़ती या घटती है. ऐसा खाना, जो यौन भावनाएं बढ़ाता है, उसे वैज्ञानिक भाषा में एफ्रोडिजिएक फूड कहते हैं. लाल फल, खजूर, चॉकलेट, स्ट्रॉबरी, तरबूज और प्रोटीन के बहुत से सोर्स जिनमें मांस भी शामिल है, इस श्रेणी में आता है.

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