
आशियाने ही नहीं बचपन की यादों पर भी लाल क्रॉस...जोशीमठ आपदा से वर्तमान ही नहीं भविष्य भी अंधेरे में
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जोशीमठ में आई त्रासदी ने सैकड़ों जिंदगियों के सामने अंधेरा ला दिया है. खतरे की जद में आए घरों पर लाल निशान लगाकर लोगों को खाली करने के लिए कह दिया गया है. 80 से ज्यादा परिवारों को या तो सुरक्षित होटलों में या राहत कैंपों में रखा गया है.
जोशीमठ शहर के बीचो बीच पहाड़ पर बना एक घर. इस घर पर भी जोशीमठ के अन्य 700 घरों की तरह बड़ी बड़ी दरारें पड़ गई हैं. प्रशासन ने लाल क्रॉस का निशान लगा दिया है. यानी ये घर अब रहने के लायक नहीं. इस घर में रेखा का बचपन बीता था, जहां वह अपने भाइयों-बहनों के साथ खेली, पली और बढ़ी. लेकिन रेखा से ये घर खाली करने के लिए कह दिया गया. अब रेखा के घर पर ही नहीं, बल्कि 38 सालों की यादों पर भी लाल क्रॉस लगा दिया गया.
जोशीमठ में आई त्रासदी ने सैकड़ों जिंदगियों के सामने अंधेरा ला दिया है. खतरे की जद में आए घरों पर लाल निशान लगाकर लोगों को खाली करने के लिए कह दिया गया है. 80 से ज्यादा परिवारों को या तो सुरक्षित होटलों में या राहत कैंपों में रखा गया है. जोशीमठ के जिन इलाकों में दरारों से पानी निकल रहा है, वहां रहने वाले लोग अपना घर छोड़कर नहीं जाना चाहते. उसकी बड़ी वजह है, अनिश्चितता का माहौल और सरकार से न-उम्मीदी.
रेखा 38 साल की हैं. उनके घर पर लाल निशान लगा दिया गया. इसी घर में रेखा पैदा हुईं. अपने तीन बहनों और भाइयों के साथ यहीं पली बढ़ी. जोशीमठ में जिन दो होटलों माउंट व्यू और मल्हारी को गिराया जा रहा है, उसके ठीक सामने पहाड़ पर रेखा का घर है जो अब खतरे की जद में है. इसलिए प्रशासन ने घर पर लाल निशान लगा दिया है.
घर के बरामदे से लेकर किचन और बेडरूम तक ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जहां दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें न दिख रही हों. जिस घर को खून पसीने की कमाई से बनाया गया, हर कोने में यादों का पिटारा था, उस घर को छोड़कर जाने के लिए रेखा मजबूर हैं. वे घर छोड़ने से पहले हर कोने की तस्वीर और वीडियो रिकॉर्ड कर रही हैं, ताकि इन्हें यादों में संजोया जा सके.
रेखा के हाथ में मोबाइल फोन है, लेकिन आंखों में आंसू और जेहन में भविष्य की चिंता है. उन्हें नहीं पता कि अब आगे क्या होगा? रेखा बताती हैं, यहां हम सब बहनें और मेरे भाई खेलते थे, साथ बैठकर जमीन पर खाना खाते थे और यहीं पर हमारा बचपन बीता था. कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा आएगा, जब यह घर ही नहीं बचेगा. रेखा कहती हैं कि घर को छोड़ने पर बहुत दर्द हो रहा है, लेकिन हम जाएं तो जाएं कहां. प्रशासन हमें कहां रखेगा, कितनी जगह देगा यह पता नहीं. अब चिंता इस बात की है कि हमारा हमारे परिवार का और बच्चों का भविष्य क्या होगा हम उन्हें कैसी जिंदगी देंगे ?
जोशीमठ के उन तमाम परिवारों की कहानी रेखा की तरह ही है, जो या तो राहत कैंपों में चले गए हैं या जिन्हें घर खाली करने के लिए कह दिया गया है. रेखा के घर के पास ही बिंदु का घर है. बिंदु के भाई और उनके परिवार के सदस्यों ने यह नया मकान 2 महीने पहले ही तैयार करवाया था और फरवरी में सभी रिश्तेदार इकट्ठा होने वाले थे. इससे पहले परिवार नए घर की खुशियां मनाता, जोशीमठ में आई त्रासदी ने उन खुशियों पर नजर लगा दी. बिंदु के घर के नीचे दरार पड़ गई है. पीछे का हिस्सा भी दरक रहा है और अब प्रशासन ने घर पर और घर की दीवारों पर लाल निशान लगा दिया है. बिंदु के भाई संजय जैसे ही देहरादून से घर पहुंचे तो घर पर लगे लाल निशान और आंखों में आंसू लिए बैठी बिंदु को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगे. संजय के पास कोई शब्द नहीं थे, अपनी पीड़ा बयान करने के लिए. लेकिन बिंदु ने अपनी व्यथा बयां करते हुए कहा कि हम सभी भाई बहनों को इस घर में साथ रहना था और बड़े अरमानों से हमने इस नए घर के सपने देखे थे. लेकिन अब प्रशासन कह रहा है कि घर खाली करो.

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