
आरा से लखनऊ तक अंग्रेज़ों को चुनौती देने वाले कुँवर सिंह की कहानी
BBC
कुँवर सिंह की ख़ासियत ये थी कि वे 1857 के विद्रोह के दौरान तकरीबन एक साल तक ज़ोरदार छापामार युद्ध लड़ते रहे.
फ़्रांसिस बुकानन ने अपनी किताब 'एन अकाउंट ऑफ़ द डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ़ बिहार एंड पटना' में लिखा था, "सन 1812 में आरा शहर में कुल 2775 घर थे और औसतन एक घर में आठ लोग रहते थे.''
''उस हिसाब से शहर की कुल आबादी थी करीब 22 हज़ार. तब शहर में दो अच्छी सड़कें हुआ करती थीं. कलक्टर की एक कोठी थी और सर्जन का एक बंगला था. शहर के बीचोबीच एक जामा मस्जिद थी."
25 जुलाई, 1857 को दानापुर में सिपाहियों ने विद्रोह किया था. उस दिन तक आरा शहर शांत था. रविवार की रात यानी 26 जुलाई की रात भी शहर में कोई हलचल नहीं थी, यहां तक कि सोमवार की सुबह भी.
प्रसन्न कुमार चौधरी अपनी किताब '1857, बिहार में महायुद्ध' में लिखते हैं, "अचानक बाग़ी सिपाहियों ने आरा के पूर्वी कोने से शहर में प्रवेश किया. सैनिकों के साथ शहर के निम्न वर्ग के लोग भी शामिल हो गए. सिपाहियों ने जेल तक मार्चपास्ट किया और जेल का गेट खोल दिया.''
''पलक झपकते ही पाँच सौ क़ैदी जेल से मुक्त हो गए. इसके बाद विद्रोहियों ने ख़ज़ाने से करीब 85 हज़ार रुपए लूट लिए. 29 जुलाई को उन्होंने अहमद अली नाम के दारोगा को मार दिया. शाहाबाद के मजिस्ट्रेट ने सुना, रेलवे इंजीनियर बायल की कोठी घेरने वाले सिपाही चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि वे कुंवर सिंह के हुक्म का पालन कर रहे हैं.''
''बाग़ी सिपाहियों ने आरा पहुंचने के दूसरे दिन मुनादी पिटवाई, 'ख़ल्के ख़ुदा, मुल्क देनदारों का, हुक्म बाबू कुँवर सिंह का, प्रजा अपना काम-काज जारी रखे. झगड़ा सिर्फ़ बादशाह यानी अंग्रेज़ों से है."
27 जुलाई से 2 अगस्त तक यानी एक सप्ताह तक आरा पर बाग़ियों का क़ब्ज़ा रहा. इसके बाद मेजर आयर की सेना ने आरा पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया था.













