
अफ्रीका में जंग के बीच गहराया जैविक हमले का खतरा... क्या है बायो वेपन, जो बिना खूब बहाए दुनिया को कर सकता है खत्म?
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सूडान में जारी लड़ाई के बीच जर्म वॉरफेयर की बात हो रही है. डर जताया जा रहा है कि वहां जैविक युद्ध न शुरू हो जाए. अगर ऐसा होता है तो बिना गोला-बारूद के ही तबाही मच जाएगी. फिर ये अफ्रीका तक सिमटी नहीं रहेगी, बल्कि दुनिया के बहुत से मुल्क पटापट खत्म होने लगेंगे. कई देश पहले भी ऐसी कोशिश कर चुके हैं.
सूडान में गृहयुद्ध छिड़े हफ्तेभर से ज्यादा समय हो चुका है. इस बीच रैपिड सपोर्ट फोर्स ने खारतूम की नेशनल पब्लिक हेल्थ लैब पर कब्जा कर लिया. ये वो लैब है, जहां खतरनाक बीमारियों के वायरस और बैक्टीरिया रखे हुए हैं. फोर्स ने लैब तक पहुंचने के सारे रास्ते बंद कर दिए. इस बीच वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने डर जताया है कि शायद लैब में घातक जीवाणु बम तैयार होने लगें. इससे सूडान की लड़ाई दुनियाभर में बायोलॉजिकल युद्ध में बदल सकती है. इसे लेकर पहले भी वैज्ञानिक चेताते रहे हैं.
9/11 के बाद एंथ्रेक्स अटैक सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क में हुए आतंकी हमले के बाद वहां जैविक हमला भी हुआ था. कई पत्रकारों और नेताओं को ऐसी चिट्ठियां और कागजात मिले, जिन्हें छूने के बाद वे बीमार पड़ने लगे. बाद में पता लगा कि उनमें एंथ्रेक्स नाम के खतरनाक बैक्टीरिया भी थे. कुछ ही दिनों बाद भारत में भी पोस्टल डिपार्टमेंट में 17 ऐसी संदिग्ध चिट्ठियां पहुंची. लिफाफे में सफेद पाउडर लगा हुआ था. लेकिन जांच पर पता लगा कि किसी ने डराने के लिए ऐसा मजाक किया था. हालांकि इसके बाद से जैविक हमले पर खूब बात होने लगी.
क्या है जैविक हमला? मकसद इसका भी वही होता है, दुश्मन देश या लोगों को मारना या कमजोर बना देना. बस, इसमें हथियारों का रूप बदल जाता है. तोप, गोला-बारूद की बजाए जानलेना बैक्टीरिया, वायरस या फंगस का इस्तेमाल होता है. कई बार ये पीने के पानी के स्त्रोत में मिला दिए जाते हैं, तो कभी किसी और तरह से इन्हें लोगों तक पहुंचाया जाता है. इससे खून बहे बिना ही लोग बीमारियों से मरने लगते हैं. अक्सर इसका असर आने वाली कई पीढ़ियों तक देखा जा सकता है.
कब हुई इसकी शुरुआत? जैविक हथियारों का इस्तेमाल कब से शुरू हुआ, इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन सबसे पहला रिकॉर्डेड मामला साल 1347 में आया था. तब मंगोल सेना ने यूरोप को तहस-नहस करने के लिए व्यापार के लिए आए जहाजों में प्लेग के जीवाणु और प्लेग-संक्रमित चूहे डाल दिए थे. ये जहाज जब इटली के सिसली बंदरगाह पर जाकर लगा, जहाज में लगभग सारे लोग मारे जा चुके थे. जो जिंदा थे, वे जल्द ही तेज बुखार, खून की उल्टियां करने लगे.
मौत लाने वाले जहाज कहलाए कुछ ही दिनों में बीमारी सिसली से होते हुए पूरे देश और फिर स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, स्कैन्डिनेविया और बॉल्टिक पहुंच चुकी थी. मौतों का ठीक आंकड़ा अब तक बताया नहीं जा सका लेकिन माना जाता है कि इसकी वजह से एक तिहाई यूरोपियन आबादी की मौत हो गई. बाद में उन जहाजों को डेथ शिप कहा गया.
क्या हुआ था पहले वर्ल्ड वॉर में? इसके बाद भी जैविक हमले की छुटपुट घटनाएं होती रहीं, लेकिन विश्व युद्धों ने इसका सबसे भयंकर चेहरा दिखाया. पहले वॉर के दौरान जर्मनी ने एंथ्रेक्स और हैजे से इंसानी आबादी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की. वे इससे संक्रमित लाशों को दुश्मन देश के इलाके में फेंक दिया करते. जैसे ही कोई इनके संपर्क में आता, बीमारी फैल जाती. कथित तौर पर जर्मन सेना ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में भारी तबाही मचानी शुरू कर दी थी, लेकिन रूस ने बहुत सख्ती से इसे संभाल लिया. इसके बाद फसलों पर फंगस अटैक होने लगा. यहां तक कि जानवरों तक पर जैविक हमले होने लगे.

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