
ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए Trump ने रूस-चीन कार्ड खेला, लेकिन पलटवार क्यों नहीं हुआ?
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डोनाल्ड ट्रंप को ग्रीनलैंड चाहिए. क्यों? क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा न किया तो चीन या रूस वहां काबिज हो जाएंगे. फिर अमेरिका की सुरक्षा तो खतरे में पड़ेगी ही, दुनिया को भी नुकसान झेलना पड़ सकता है. ट्रंप ने अपनी जिद के पीछे यही तर्क दिया. इधर ये दोनों देश खुद पर इतने बड़े लांछन के बाद भी चुप रहे, और बोले भी तो विरोध उतना बुलंद नहीं.
ग्रीनलैंड इन दिनों सुर्खियों में है. इस बर्फीले द्वीप देश को पाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पूरा जोर लगाए हुए हैं. उनका कहना है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर अपनी पकड़ नहीं बनाई, तो चीन और रूस वहां आ जाएंगे. इससे अमेरिका की सुरक्षा को खतरा होगा और आर्कटिक क्षेत्र में ताकत का संतुलन बिगड़ जाएगा. लेकिन दिलचस्प ये है कि जिन दो देशों का नाम लेकर यह डर दिखाया जा रहा है, वे खुद ज्यादा शोर नहीं मचा रहे.
क्या चीन और रूस घरेलू झंझटों में इतने उलझे हैं कि इस मुद्दे को तवज्जो नहीं दे रहे, या फिर यह चुप्पी जानबूझकर चुनी गई?
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का अर्ध स्वायत्त क्षेत्र है, जिसे पाने के लिए ट्रंप प्रशासन कई महीनों से लगा हुआ है. हाल में इसमें तेजी आई. प्रो-अमेरिका रहता आया यूरोप तक इसका विरोध कर रहा है. वहीं रूस और चीन जैसे घोर-अमेरिका विरोधी देश लगभग शांत हैं. चीन में विरोध के हल्के सुर उठे, लेकिन मॉस्को अलग ही रवैया दिखा रहा है.
क्रेमलिन की तरफ से तो कोई बयान नहीं आया, जबकि रूसी मीडिया ट्रंप की तारीफों के पुल बांध रहा है. वहां के नेशनल डेली रोस्सिस्काया गजेटा में लिखा गया कि अगर ट्रंप प्रशासन की कोशिशों से ग्रीनलैंड यूएस का हिस्सा बन जाए तो अमेरिका की जनता इस उपलब्धि को नहीं भूलेगी.
दूसरी तरफ बीजिंग ने साफ कहा कि अमेरिका अपने फायदे के लिए तथाकथित चीनी खतरे की आड़ न ले. चीन का मानना है कि अमेरिका जानबूझकर उसे खतरा बताते हुए खुद ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहता है ताकि फिर वो आराम से वहां अपनी मिलिट्री बढ़ाए और संसाधनों का इस्तेमाल कर सके.
यहीं सवाल उठता है. क्या चीन और रूस सच में अपने घरेलू मसलों में इतने उलझे हैं कि प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं समझ रहे. या फिर यह जानबूझकर चुनी गई चुप्पी है.

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