
UGC के नए नियमों का बीजेपी के अंदर ही इतना विरोध क्यों हो रहा? विपक्ष के चुप्पी के मायने
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिसे लेकर अगड़ी जाति के लोग विरोध में उतर गए हैं. इतना ही नहीं बीजेपी के सवर्ण नेता भी अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं तो विपक्ष खामोशी अपना रखी है.
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक नया नियम लागू होने से सियासत गरमा गई है. शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के मकसद से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026' के रूप में नये नियम लागू किए हैं. यूजीसी के नए नियम को लेकर एक तरफ जहां सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ विरोध के सुर उठने लगे हैं. खासकर अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और प्रभावशाली नेताओं ने इस लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.
यूजीसी के नए नियमों को लेकर बवाल इतना बढ़ गया है कि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. सवर्ण जाति संगठनों ने आंदोलन तेज करने की धमकी दे डाली है. बीजेपी में भी इसे नए नियम को लेकर विरोध बढ़ता जा रहा है. कई मौजूदा और पूर्व सांसदों और विधायकों ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है. जबकि विपक्ष चुप है. ऐसे में सवाल उठता है कि सबसे ज्यादा बेचैनी बीजेपी के नेताओं में ही दिख रही है?
नए नियम को लेकर बीजेपी नेता बेचैन यूजीसी के नए नियम को लेकर बीजेपी के अंदर से ही विरोध उठने लगे हैं. बीजेपी के दिग्गज नेता बृजभूषण शरण सिंह के विधायक बेटे प्रतीक भूषण ने बिना नाम लिए यूजीसी के नियमों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि इतिहास के दोहरे मापदंडों पर अब गहन विवेचना होनी चाहिए जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के भीषण अत्याचारों को 'अतीत की बात'कहकर भुला दिया जाता है, जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को निरंतर 'ऐतिहासिक अपराधी' के रूप में चिन्हित कर वर्तमान में प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है.
कानपुर के बिठूर से बीजेपी विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने भी यूजीसी के नए नियम पर अपनी नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने कहा है कि इस कानून की सरकार को समीक्षा करनी चाहिए और सबकी सुरक्षा को सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि समाज को न्याय मिल सके. इसके अलावा बीजेपी एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को पत्र लिखकर कहा कि प्रस्तावित प्रावधान सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इससे उच्च शिक्षा व्यवस्था में जातीय तनाव बढ़ने की आशंका है. इससे देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो सकती है और समाज में जातीय संघर्ष को बढ़ावा मिल सकता है.
बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ संजय सिंह ने भी यूजीसी के नए नियम का विरोध किया है. उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात से शिक्षण संस्थानों में चिंता और आशंका का माहौल बन रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि बिना संतुलित प्रतिनिधित्व के बनाई गई समितियां न्याय नहीं कर सकतीं. ऐसी समितियां सिर्फ औपचारिक निर्णय देती हैं, जिससे समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता. न्याय के पथ पर चलते हुए हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए. उनका कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की असमानता न रहे.
बीजेपी नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि मोदी है तो मुमकिन है. विश्वास रखिए यूजीसी के नोटिफिकेशन की सभी भ्रान्तियों को दूर किया जाएगा. संविधान को आर्टिकल 14 एवं 15 के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और सामान्य वर्ग में कोई फर्क नहीं है. 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को केवल और केवल माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के कारण मिला. 1990 मंडल कमीशन लागू होने के बाद इस देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने सरकार बनाई, लेकिन न्याय केवल मोदी जी ने दिया. इंतज़ार कीजिए यूजीसी की भ्रांतियां भी ख़त्म होगी.

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