
Exclusive: उत्तर बंगाल का किला कैसे फतह करेगी BJP, चुनाव में नई 'रणनीति' तैयार
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Bengal Assembly Elections: चुनावी सरगर्मी के बीच उत्तर बंगाल एक बार फिर राजनीतिक रणभूमि बनता दिख रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने इस क्षेत्र में जीत के लिए जोर-शोर से लगी हुई है. इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व के साथ प्रदेश के कई बड़े नेता ठोस रणनीति बनाकर काम कर रहे हैं.
पश्चिम बंगाल चुनाव के मद्देनजर उत्तर बंगाल एक बार फिर राजनीति के केंद्र में है. बीजेपी ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए नई रणनीति तैयार की है. इसमें घर-घर पहुंच बनाना, स्थानीय मुद्दों को उभारना और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर सीधा हमला शामिल है. 54 सीटों वाले इस इलाके में सियासी मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है.
सिलीगुड़ी में हुई बीजेपी की एक उच्चस्तरीय संगठनात्मक बैठक के बाद रणनीति तैयार की गई. इसमें तय हुआ कि उत्तर बंगाल के स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा जाएगा. बीजेपी का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने उत्तर बंगाल की उपेक्षा की है. बीजेपी इस मुद्दे को इलाके की स्थानीय जनता के बीच प्रमुखता से उठाने जा रही है.
बीजेपी बताएगी कि राज्य के कुल बजट का महज 0.002 फीसदी हिस्सा ही उत्तर बंगाल को दिया गया. आपदा राहत कोष के 5899 करोड़ रुपए रोके रखने का आरोप लगाते हुए बाढ़ और भूस्खलन पीड़ितों की अनदेखी का मुद्दा भी उठाया जाएगा. बागडोगरा एयरपोर्ट के विस्तार में देरी जैसी केंद्रीय परियोजनाओं में रुकावट की बात सामने लाई जाएगी.
इसके साथ ही चाय बागान मजदूरों के मुद्दे और केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयन को भी चुनावी मुद्दा बनाया जाएगा. तस्करी गिरोहों को संरक्षण और राजनीतिक हिंसा जैसे आरोपों को भी जनता के बीच ले जाने की तैयारी है. इस रणनीति को अंतिम रूप देने के लिए हुई बैठक में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता जैसे सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव मौजूद रहे.
इस बैठक में उम्मीदवारों और जिला नेताओं के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र के लिए चुनावी रोडमैप तैयार किया गया. उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटें इस चुनाव में बेहद अहम मानी जा रही हैं. यही वह क्षेत्र है, जहां बीजेपी पिछले कुछ चुनावों में लगातार अपनी पकड़ मजबूत करती रही है. दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर साल 2009 से बीजेपी का कब्जा रहा है.
वहां से जसवंत सिंह, एसएस अहलूवालिया और मौजूदा सांसद राजू बिस्ता जीतते रहे हैं. यह कभी कांग्रेस और वाम मोर्चा का गढ़ माना जाता था. यहां ज्यादातर आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों का दबदबा है. इस इलाके में अब सीधी टक्कर बीजेपी और टीएमसी के बीच है. हालांकि, पिछले दो वर्षों में टीएमसी ने यहां अपनी पकड़ थोड़ी मजबूत की है.

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