
8X8 का कमरा 7 लोगों का ठिकाना, दिनभर में ₹70 की कमाई... जानें हिंसा के 1 साल बाद किस हाल में मणिपुर के लोग
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लगभग 37 लाख की आबादी वाले मणिपुर के इतिहास में कई घटनाएं हुई हैं. लेकिन पिछले 1 साल में मणिपुर में जो हुआ, इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी. अदालत के एक आदेश के बाद 3 मई 2023 को मणिपुर की घाटी और पहाड़ों में रहने वाले 2 समुदायों के बीच ऐसी जंग छिड़ गई थी, जिसका अभी तक अंत नहीं हो सका है. इंफाल समेत पूरी घाटी में रहने वाले मैतेई बहुल इलाकों और घाटी के चारों तरफ पहाड़ों पर रहने वाले कुकी आदिवासी बहुल इलाकों के बीच एक अनकही खाई बन गई है.
सालभर पहले मणिपुर में कुछ ऐसा हुआ जिसने एक ही राज्य में रहने वाले लोगों के बीच लंबी लकीर खींच दी. कहीं गोलीबारी तो कहीं आगजनी, कहीं महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया गया तो कहीं मासूमों को मार दिया गया. बीता एक साल मणिपुर के लिए हिंसा का ऐसा दौर लेकर आया, जिसकी कल्पना इस पूर्वोत्तर राज्य ने नहीं की थी. हिंसा के आक्रामक दौर को 1 साल बीत चुका है, लेकिन इस एक बरस में मणिपुर के जमीनी हालात कितने बदले, जानते हैं इस ग्राउंड रिपोर्ट में...
इंफाल की सड़कों पर अब लोगों की चहल-पहल पहले से ज्यादा दिखाई देती है, स्कूल, अस्पताल, दुकान, मकान, प्रतिष्ठान अब सामान्य रूप से सुचारू हो चुके हैं. इंफाल की जिन सड़कों पर शाम को 5 बजे के बाद कर्फ्यू लग जाता था वहां हालात सामान्य हो गए हैं. यहां के हालात ऐसा लगता है कि रोजमर्रा के संघर्ष में इंफाल के लोग बीते एक साल का जख्म भूल गए हैं.
रंजीत कुमार बताते हैं कि 1 साल पहले गोलियां चलती थीं, कर्फ्यू लगते थे लेकिन अब हालात पहले से बेहतर हैं, लेकिन जिरिबाम जैसे कुछ इलाकों में एक बार फिर हिंसक झड़प शुरू हो गई है. रंजीत सिंह कहते हैं कि चुनाव तक सब शांत था, लेकिन चुनाव खत्म होते ही हिंसा का दौर कुछ इलाकों में लौट रहा है.
घर-जमीन छोड़कर भागने को मजबूर हुए लोग
लगभग 37 लाख की आबादी वाले मणिपुर के इतिहास में कई घटनाएं हुई हैं. लेकिन पिछले 1 साल में मणिपुर में जो हुआ, इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी. अदालत के एक आदेश के बाद 3 मई 2023 को मणिपुर की घाटी और पहाड़ों में रहने वाले 2 समुदायों के बीच ऐसी जंग छिड़ गई थी, जिसका अभी तक अंत नहीं हो सका है. इंफाल समेत पूरी घाटी में रहने वाले मैतेई बहुल इलाकों और घाटी के चारों तरफ पहाड़ों पर रहने वाले कुकी आदिवासी बहुल इलाकों के बीच एक अनकही खाई बन गई है, हिंसा के बाद हिंदू मैतेई बहुल इलाकों से कुकी आदिवासी समाज के लोग अपना घर, जमीन छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए, तो वहीं कुकी बहुल इलाकों में रहने वाले हिंदू सब कुछ छोड़कर या तो इंफाल घाटी में लौट आए या राज्य छोड़कर दिल्ली समेत दूसरे इलाकों में बसने पर मजबूर हो गए.
'घर की याद आती है तो रोना आता है'

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