
3 पत्नियां, 3 बच्चे... किसे मिलेगी संजय कपूर की प्राॅपर्टी, जानिए- भारत का उत्तराधिकार कानून क्या कहता है?
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बिजनेसमैन संजय कपूर की मौत के बाद उनकी संपत्ति पर विवाद ने एक बार फिर दिखा दिया है कि जब परिवार में कई शादियां, अलग-अलग रिश्तों से बच्चे और उलझे रिश्ते हों, तो उत्तराधिकार की लड़ाई कितनी पेचीदा हो सकती है. भारतीय कानून इस हालात में किसे असली वारिस मानता है और किसे बाहर करता है, यही अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है.
कुछ लोग दुनिया से जाने के बाद अपने पीछे कई पत्नियां, अलग-अलग शादियों से बच्चे या जटिल पारिवारिक रिश्ते छोड़ जाते हैं. भारत में अक्सर ऐसे व्यक्ति की मौत के बाद संपत्ति विवाद काफी पेचीदा हो जाते हैं. हाल ही में दिवंगत बिजनेसमैन संजय कपूर की संपत्ति पर चल रहे मुकदमे ने ब्लेंडेड फैमिली (मिली-जुली पारिवारिक स्थिति) की उलझन सामने ला दी है. इससे पता चलता है कि उत्तराधिकार की लड़ाई कितनी उलझ सकती है.
समझिए कानूनी वारिस कौन होता है?
भारतीय कानून में इसका जवाब मृतक व्यक्ति के धर्म पर निर्भर करता है. मसलन हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) लागू होता है. इस एक्ट में क्लास I वारिस (Class I heirs) यानि जीवित पत्नी/पति, बच्चे और मां को सबसे ऊपर रखा गया है. सभी क्लास I वारिस बराबर हिस्से के हकदार होते हैं. लेकिन अगर मृतक ने वसीयत (will) बनाई है, तो उसकी वैधता और सबूत की जांच Indian Succession Act, 1925 के तहत होती है.
वहीं ईसाई, पारसी और यहूदी धर्म में इनके लिए Indian Succession Act, 1925 लागू होता है. इसमें जीवित पत्नी/पति, बच्चे और माता-पिता के बीच संपत्ति बांटने की व्यवस्था दी गई है. वहीं मुस्लिम के लिए पर्सनल कानून लागू होता है जिसमें पति-पत्नी, बेटे-बेटियां, माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों के लिए तयशुदा हिस्से निर्धारित होते हैं.
मतलब, मृतक की संपत्ति उसी धर्म के लागू कानून (Hindu Succession Act, Indian Succession Act या मुस्लिम पर्सनल लॉ) के हिसाब से बांटी जाती है. इन कानूनों में ये तय किया गया है कि पहले किसे प्राथमिकता मिलेगी और हिस्से किस तरह बंटेंगे.
अगर कई पत्नियां हों तो?

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