
सेजल ने फंसाया! ब्रह्मोस साइंटिस्ट निशांत अग्रवाल बरी, पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का था आरोप
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ब्रहमोस मिसाइल सेंटर में काम कर चुके वैज्ञानिक निशांत अग्रवाल सात साल बाद नागपुर जेल से रिहा हो गए. बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें पाकिस्तानी एजेंट से लिंक्डइन पर अनजाने में हुए संपर्क और कथित जासूसी के आरोपों से बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ‘गिल्टी माइंड’ यानी दुर्भावना साबित नहीं कर पाया और किसी गोपनीय जानकारी के जानबूझकर साझा करने का सबूत नहीं मिला.
ब्रहमोस मिसाइल प्रोजेक्ट में काम कर चुके युवा वैज्ञानिक निशांत अग्रवाल आखिरकार सात साल बाद नागपुर सेंट्रल जेल से बाहर आ गए. बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने उन्हें पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोपों से बरी कर दिया. 2018 में गिरफ्तार हुए अग्रवाल को ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ “इरादा” और “सबूत” दोनों ही साबित नहीं हुए.
लिंक्डइन की एक गलती बनी मुसीबत निशांत अग्रवाल के लिए मुश्किलें तब शुरू हुईं जब उन्होंने लिंक्डइन पर एक “सेजल कपूर” नाम की प्रोफाइल से आए रिक्वेस्ट को स्वीकार किया. उन्हें पता नहीं था कि यह अकाउंट पाकिस्तान से ऑपरेट किया जा रहा है. नौकरी के बहाने हुई चैट के दौरान उनसे एक सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने को कहा गया, जो बाद में मालवेयर निकला.
जांच में पता चला कि निशांत ने न तो कोई गुप्त दस्तावेज साझा किए और न ही किसी सिस्टम में लॉगिन कराया. ब्रहमोस संगठन की ओर से लिंक्डइन इस्तेमाल करने पर भी कोई रोक नहीं थी.
ATS और हाईकोर्ट की जांच में नहीं मिला कोई सबूत यूपी एटीएस के अधिकारियों ने कोर्ट में कहा कि निशांत ने न तो कोई संवेदनशील जानकारी भेजी और न किसी दस्तावेज को अपलोड किया. उनके लैपटॉप से जो फाइलें मिलीं, वे दरअसल 2013 की ट्रेनिंग किट का हिस्सा थीं, जो बैच के सभी 23 वैज्ञानिकों को दी गई थीं.
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि निशांत का “गिल्टी माइंड” था यानी वह जानबूझकर कोई अपराध कर रहे थे. न ही यह साबित हुआ कि उन्होंने किसी जानकारी का गलत इस्तेमाल किया.
कोर्ट ने ‘हनीट्रैप’ थ्योरी भी खारिज की प्रॉसिक्यूशन ने दावा किया था कि निशांत एक हनीट्रैप में फंस गए, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि यह आरोप भी साबित नहीं हुआ. न कोई गलत संचार हुआ और न ही निशांत ने कोई गोपनीय जानकारी साझा की.

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