
संघ के 100 साल: 'नमो मातृभूमि' से कैसे बनी 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे...' RSS की आधिकारिक प्रार्थना
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संघ की यात्रा में इसकी प्रार्थना चुनना भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. आखिर इस प्रार्थना से संघ की पहचान तय होनी थी. क्या आप जानते हैं कि ये संघ की पहली प्रार्थना नहीं है? क्या थी ऑरिजिनल प्रार्थना, इसे क्यों बदला गया? आरएसएस के 100 सालों की, 100 कहानियों में आज कहानी इसकी प्रार्थना की.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा में इसकी प्रार्थना का भी अपना योगदान रहा है. ये प्रार्थना जिसे लोग अलग से पहचान जाते हैं, कैसे लिखी गई इसकी भी एक कहानी है. क्या आप जानते हैं कि पहले संघ की ऑरिजिनल प्रार्थना क्या थी? संघ की 100 साल की यात्रा पर, 100 कहानियों की इस सीरीज में आज संघ की प्रार्थना की कहानी.
कोई भी संगठन समय के साथ विस्तार लेता है तो समय और परिस्थिति के अनुसार बदलाव भी उसमें स्वाभाविक हैं. संघ के साथ भी ऐसा हुआ. जब संघ की नियमित शाखाएं शुरू हुईं, तो उनमें जन्मभूमि को नमन करती एक प्रार्थना होती थी, जिसे खुद डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने साथियों के साथ मिलकर तैयार करवाया था. चूंकि उन दिनों नागपुर में मराठी के साथ हिंदी मिलाकर बोली जाती थी, सो ये प्रार्थना भी हिंदी के कुछ शब्दों के साथ मूल रूप से मराठी में ही थी. संघ में बदलाव आसानी से नहीं होते, सो 1939 तक यही प्रार्थना संघ के कार्यक्रमों में गाई जाती रही.
छत्रपति शिवाजी से है संघ की प्रार्थना का कनेक्शन बदलाव की प्रेरणा मिली संघ के विस्तार से और छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मोहर से जो संस्कृत में थी. वैसे भी देश भर में संस्कृत ही ऐसी भाषा थी, जो तमाम विदेशी आक्रांताओं द्वारा अपनी भाषाओं के थोपे जाने के बावजूद ना केवल भारत की प्राचीन सांस्कृतिक कड़ी थी, बल्कि देश भर में जानी जाती थी. 1939 में हुई एक बैठक में ये तय किया गया कि संघ की प्रार्थना संस्कृत में होनी चाहिए, बल्कि संघ के प्रशिक्षण या शाखाओं में जो निर्देश दिए जाते हैं, उनमें जो मराठी या अंग्रेजी के शब्द बोले जाते हैं, उनको भी संस्कृत से बदल दिया जाना चाहिए.
ये बैठक फरवरी 1939 में नागपुर से 50 किमी दूर, सिंदी में संघ के वरिष्ठ अधिकारी नाना साहेब तलातुले के आवास पर हुई थी. दिलचस्प बात ये थी कि इतना बड़ा निर्णय लेने वाली इस बैठक में संघ के तीन-तीन सरसंघचालक उपस्थित थे. एक तत्कालीन डॉ. हेडगवार और बाकी दो भविष्य में होने वाले. यानी दूसरे गुरु गोलवलकर और तीसरे बाला साहेब देवरस, साथ में अप्पाजी जोशी, विट्ठल राव पटकी, तात्याराव तेलंग, बाबाजी सालोडकर और कृष्णराव मोहरिल जैसे वरिष्ठ संघ अधिकारी भी उपस्थित थे.
इस बैठक में सबसे पहले तो पिछले 14 साल में संघ के कार्यों की विस्तार से समीक्षा की गई, यानी 1926 से 1939 तक संघ ने क्या-क्या किया. उसके बाद मराठी प्रार्थना को संस्कृत में किए जाने का निर्णय लिया गया, मोहिते का बाड़ा की शाखा के कार्यवाह और संस्कृत के विद्वान नरहरि नारायणराव भिड़े को जिम्मा सौंपा गया कि वही हेडगेवार और गुरु गोलवलकर के निर्देशों के अनुसार मराठी प्रार्थना का शब्दश: संस्कृत अनुवाद करेंगे.
साथ ही तय किया गया कि प्रशिक्षण या शाखा निर्देशों में जो भी मराठी या अंग्रेजी शब्द हैं उनको संस्कृत शब्दों से बदला जाएगा. दरअसल पहले सरसेनापति ही शुरुआती प्रशिक्षण के लिए उत्तरदायी थे. और वो आर्मी से रिटायर्ड थे, तो उन्होंने शुरू में अटैंशन, राइट टर्न, मार्च, हाल्ट जैसे शब्दों का ही प्रयोग किया था.

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