
संघ के 100 साल: 'उठो केशव शस्त्र उठाओ...', बोस, सावरकर की अपील टालकर अहिंसा पर डटे रहे हेडगेवार
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डॉ हेडगेवार की जिंदगी में एक ऐसा मौका आया जब सुभाषचंद्र बोस उनके पास अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का प्रस्ताव लेकर आए थे. हेडगेवार के लिए ये दुविधा की स्थिति थी. हेडगेवार ने इसका क्या जवाब दिया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
हर महान व्यक्ति लक्ष्य तय करने तक अपने जीवन में ढेर सारे प्रयोगों और विचारधाराओं से गुजरता है. डॉ केशव बलिराम हेडगेवार भी इससे अछूते नहीं थे. बचपन से ही वो क्रांतिकारी बनना चाहते थे. वंदेमातरम ना बोलने के खिलाफ आंदोलन करना हो, रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की वर्षगांठ की मिठाई को कूड़ेदान में फेंकना हो या फिर नागपुर के किले तक सुरंग खोदकर ब्रिटिश झंडे की जगह भगवा ध्वज फहराने की योजना.
अगर उनके विचार ना बदले होते तो क्रांतिकारियों की सूची में उनका भी नाम होता. उनका ये जुनून युवावस्था में भी जारी रहा. कलकत्ता में अनुशीलन समिति के लिए क्रांतिकारियों को हथियार पहुंचाने के काम में जुट गए. बाद में तिलक और मुंजे जैसे नेताओं के प्रभाव में कांग्रेस का रुख किया और जमकर काम भी किया. लेकिन संघ की स्थापना एक क्रांति थी. इतने बड़े-बड़े नेताओं ने उन्हें हथियार बंद क्रांति का प्रस्ताव दिया मगर वो अहिंसा पर डटे रहे. ये वाकई में उनके बचपन और जवानी के जुनून से एकदम अलग किस्म का निर्णय था.
डॉ. हेडगेवार को अनुशीलन समिति और कांग्रेस में काम करने के बाद धीरे-धीरे ये समझ आ गया था कि हिंसा का खुलेआम रास्ता अपनाने का परिणाम या तो काला पानी है या फिर मौत. इसके साथ ही संगठन भी खत्म हो जाना है. हेडगेवार के मन में तो ये पहले से था कि राजनीतिक आजादी के बाद भी आर्थिक और सांस्कृतिक आजादी की लड़ाई लड़नी है. देश को समृद्धि के शिखर पर लाना है तो संगठन को दशकों तक जिंदा रखना होगा, पूरे देश में पहुंचाना होगा और हर समय हर विरोधी पर नजर रख रही ब्रिटिश सरकार उसे खत्म करने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देगी.
आपको ये गांधीजी की तरह का अहिंसक तरीका लगे, लेकिन असल में ये तरीका असली केशव यानी श्रीकृष्ण का था. संगठन अहिंसा के रास्ते ही चलेगा लेकिन क्रांतिकारियों को गुपचुप मदद भी जारी रहेगी यानी समय के अनुसार रणनीति.
इसीलिए हेडगेवार ने आंदोलनों में संघ के नाम से भाग नहीं लिया, बल्कि सभी को व्यक्तिगत स्तर पर भाग लेने की अनुमति दी, खुद भी सरसंघचालक के पद से इस्तीफा देकर ही जंगल सत्याग्रह में गए. हालांकि उनके मन में क्या था ये आप सरसेनापति के पद, मिलिट्री जैसी ट्रेनिंग और यूनीफॉर्म (गणवेश) से ही समझ सकते हैं. मार्तंड राव जोग जैसे रिटायर्ड सैन्य अधिकारी ने ही ट्रेनिंग की कमान संभाली थी.
भगत सिंह के साथ सुखदेव को शरण दी, ना जाने कितने क्रांतिकारियों को छुपने में मदद की, कितनों को हथियार और धन उपलब्ध करवाया लेकिन संघ को इन सबसे बचाकर उसके विस्तार में लगे रहे. मध्य भारत से निकालकर वह धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार, पंजाब, बंगाल, बिहार आदि प्रदेशों में करने में जुट गए.

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