
श्रीरामचरित मानस कथाः आखिर क्यों ऋषि दुर्वासा को मारने दौड़ा सुदर्शन चक्र, जानिए ये कथा
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चित्रकूट में श्रीराम और सीता कुछ समय के लिए रहे थे. एक दिन श्रीराम ने वनफूलों से कुछ आभूषण बनाए और सीताजी को पहनाया. उसी दौरान इंद्र पुत्र जयंत आया. उसे लगा कि भले ही महाविष्णु नर अवतार में राम हैं, लेकिन हैं तो मनुष्य ही. ऐसे में उस मूर्ख को शरारत सूझी और वह कौवे का रूप बनाकर आया और सीताजी के पैर में चोंच मार दी. वह श्रीराम के बल की सीमा जानना चाहता था.
श्रीराम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा की कहानियों को आगे बढ़ाते हुए, छोटे-छोटे अन्य प्रसंगों का भी प्रयोग किया है. ये प्रसंग कई बार मूलकथा की स्थिति का वर्णन करने के लिए उदाहरण के तौर पर सुनाई गई हैं. तुलसीदास ने उनका पूरी तरह वर्णन न करके, सिर्फ उसके मूलभाव का चौपाई में प्रयोग करके सामने रखा है. ऐसा ही एक प्रसंग श्रीराम सीता के वन गमन का है. यह कथा चित्रकूट के समय की है.
चित्रकूट में श्रीराम और सीता कुछ समय के लिए रहे थे. एक दिन श्रीराम ने वनफूलों से कुछ आभूषण बनाए और सीताजी को पहनाया. उसी दौरान इंद्र पुत्र जयंत आया. उसे लगा कि भले ही महाविष्णु नर अवतार में राम हैं, लेकिन हैं तो मनुष्य ही. ऐसे में उस मूर्ख को शरारत सूझी और वह कौवे का रूप बनाकर आया और सीताजी के पैर में चोंच मार दी. वह श्रीराम के बल की सीमा जानना चाहता था.
तुलसीदासजी यहां लिखते हैं कि... सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥
जयंत की इस कुटिलता को देखकर श्रीराम ने बिना क्रोध किए ही बस उसे दंड देने के लिए एक तिनका उठाया और जयंत की ओर लक्ष्य करके फेंक दिया. श्रीराम के हाथ से छूटे तिनके ने ब्रह्मास्त्र का रूप धर लिया और जयंत का पीछा करने लगा. जयंत ब्रह्मलोक गया, इंद्र के पास गया, शिवलोक गया, लेकिन किसी ने उसकी रक्षा नहीं की. पूरे ब्रह्मांड में जयंत जहां जाता, तिनका वहीं पीछा करते हुए पहुंच जाता.
जयंत का पीछा करने लगा श्रीराम का तीर जयंत की इसी स्थिति का वर्णन करने के लिए तुलसीदास ने ऋषि दुर्वासा का उदाहरण लिया है. उन्होंने लिखा कि, जयंत काफी डरा और निराश हुआ. उसका मन भय और त्रास से भर गया. उसकी स्थिति वैसे ही हो गई, जैसे एक बार ऋषि दुर्वासा की हो गई थी, क्योंकि उनके पीछे श्रीहरि विष्णु का चक्र पड़ गया था. ऋषि दुर्वासा की इसी कथा को तुलसीदास ने एक पंक्ति में कह दिया है. वह लिखते हैं.
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥ भावः वह (जयंत) निराश हो गया, उसके मन में भय उत्पन्न हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था. वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय-शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा.

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