
वहां चीन का हित भी है, और अफगानी 'हाथ' भी... क्यों बलूचिस्तान की लड़ाई अब पाकिस्तान के कंट्रोल में नहीं?
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बलूचिस्तान में जो कुछ हो रहा है अगर बात उसके निदान की आती है तो इससे चीन, अफगानिस्तान और कबीलाई पहचान रहने वाले बलोच और पश्तून विद्रोहियों को अलग नहीं किया जा सकता है. इन सभी के हित बलूचिस्तान से जुड़े हैं. पाकिस्तान लॉ एंड ऑर्डर और महज क्षेत्रीय तनाव की बात कर बलूचिस्तान की समस्या का समाधान नहीं कर सकता है.
'आप शांति को स्वतंत्रता से अलग नहीं कर सकते, क्योंकि कोई भी व्यक्ति तब तक शांति से नहीं रह सकता जब तक उसे उसकी आजादी हासिल न हो.' बलूचिस्तान में ट्रेन की हाईजैकिंग, दशकों से चली आ रही हिंसा के संदर्भ में अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता मैल्कम एक्स का ये कथन बलूचिस्तान को लेकर सटीक बैठता है. बलूचिस्तान में दशकों से शांति नही है क्योंकि यहां के लोगों को आजादी नहीं है. पाकिस्तान बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की मांग का दमन 1947 से ही करता आ रहा है. ये तब की बात है जब जिन्ना ने जबरन सेना भेजकर कलात के नवाब से विलय पत्र पर लिया था.
बलोच लैंड की बगावत की चिंगारी जब पाकिस्तानी हुक्मरानों के नियंत्रण से बाहर होने लगी तो पाकिस्तानी हुक्मरानों, पाक आर्मी और ISI ने निवेश का पैंतरा चला और अपने आका चीनियों को बुला लाएं. फिर शुरू हुआ निवेश के नाम पर बलोचिस्तान का बंदरबांट.
CPEC के नाम पर यहां के संसाधन लुटने शुरू कर दिए. CEPC अरबों डॉलर का एक ऐसा सौदा था जिससे पाकिस्तानी सियासतदां और जनरल दोनों ही मालामाल हो रहे हैं और इसकी बदौलत चीन को पाकिस्तान में सीधी एंट्री मिल गई है.
बलूचिस्तान नाम के चेसबोर्ड में मोहरे सिर्फ चीन और पाकिस्तान ही नहीं है. यहां पड़ोसी अफगानिस्तान भी अहम किरदार है. काबुल की कुर्सी पर बैठने वाला हर शासक अपनी नीतियों के चश्मे से बलूचिस्तान को देखता है.
इसलिए बलूचिस्तान की लड़ाई अब सिर्फ पाकिस्तान के दायरे की बात नहीं रह गई है. इसमें अब कई अंतर्राष्ट्रीय ताकतें काम कर रही हैं. आइए दक्षिण-पश्चिम एशिया में चल रहे इस सियासी खेल को समझते हैं.
बलूचिस्तान में चीन का हित

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