
रेलवे स्टेशन या शहर ही नहीं, देश भी बदलते रहे अपने नाम, क्या है इसकी प्रक्रिया, कितना आता है खर्च?
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उत्तर प्रदेश में रेलवे स्टेशनों के नाम बदलने पर चर्चा हो रही है. वैसे स्टेशन ही नहीं, राज्यों और यहां तक कि देशों के भी नाम बदलते रहे. कुछ समय पहले ही तुर्की ने खुद को तुर्किये में बदल दिया, या चेक रिपब्लिक चेकिया कहलाने लगा. ज्यादातर देश गुलामी की याद से छुटकारा पाने के लिए नाम बदलते रहे.
आजादी के बाद से अब तक देश के 9 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों का नाम बदल चुका. शहरों, चौराहों और रेलवे स्टेशनों के नाम तो बदलते ही रहते हैं. लेकिन देशों के लिए नाम बदलना नई बात नहीं. जानें, क्यों बदलते हैं देश अपने नाम, इसकी क्या प्रक्रिया है, और कितनी जटिल है.
किन देशों ने बदले नाम
दुनियाभर की सरकारें अपने राज्यों, जिलों या जगहों के नाम बदलती रहीं. कई सरकारों ने अपने देश के नाम भी बदल डाले. आमतौर पर ये किसी पुराने गलत को सुधारने की कोशिश रही. जैसे साल 2023 में तुर्की ने यूनाइटेड नेशन्स से गुजारिश की कि वे उसका तुर्की भाषा वाला नाम तुर्किये ही इस्तेमाल में लाएं. इसके पहले चेक रिपब्लिक ने अपने अलग नाम चेकिया के लिए संसद में वोटिंग करवाई. साल 2018 में यूगोस्लाव रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया ने अपना नाम नॉर्थ मेसेडोनिया कर डाला.
कई देश अपने किसी शहर का नाम छोटे वक्त के लिए भी बदलते रहे. जैसे साल 2011 में ऑस्ट्रेलियाई शहर स्पीड ब्रीफली ने अपना नाम स्पीड किल्स कर लिया था ताकि सड़क हादसों पर जागरुकता लाई जा सके.
क्यों बदलते हैं नाम ज्यादातर देश वे हैं, जो किसी वक्त पर ब्रिटेन या किसी और देश के अधीन रहे. जैसे ब्रिटिश खोजकर्ताओं समुद्री सफर के बाद जब भी किसी पड़ाव पर पहुंचते, अपनी भाषा और सोच के मुताबिक उस जगह का नामकरण कर देते. मिसाल के तौर पर, घाना का नाम उन्होंने गोल्ड कोस्ट कर दिया. लेकिन साल 1957 में आजादी के बाद देश को वापस घाना बना दिया गया. उसके कुछ बाद में सीलॉन ने अपना नाम श्रीलंका कर लिया, और अपर वोल्टा बदलकर बुर्किना फासो हो गया.

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