
राजस्थान में टिकट बंटवारे से राहुल गांधी नाराज, समर्थकों के लिए अशोक गहलोत सबसे बेपरवाह
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राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत ने ऐसी बाड़बंदी कर रखी है कि उनकी मर्जी के बगैर किसी को टिकट न मिल सके. गांधी परिवार के पास अब एक ही विकल्प बचता है, वो चाहें तो राजस्थान को भी पंजाब बना दें. आम आदमी पार्टी की तरह बीजेपी तो पहले से ही घात लगाकर बैठी हुई है.
राजस्थान में कांग्रेस आलाकमान के लिए सब कुछ आउट ऑफ कंट्रोल हो चुका है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तो पहले भी अशोक गहलोत के हाथ का स्वाद चख चुके हैं, राहुल गांधी के सामने भी अब कोई विकल्प नहीं बचा है - राजस्थान में कांग्रेस मतलब अशोक गहलोत और कोई, ऐसा हाल हो चुका है.
अशोक गहलोत की मनमानी तो 2018 में मुख्यमंत्री बनने से पहले ही शुरू हो गयी थी, लेकिन 2020 में सचिन पायलट की बगावत के बाद बढ़ती ही गयी. और 2023 के चुनाव की तारीख आते आते राहुल गांधी ने एक बयान देकर अशोक गहलोत को खुल कर खेलना का मौका दे दिया है. राहुल गांधी ने न जाने क्या सोच कर कहा था कि राजस्थान में कांटे की टक्कर है, लेकिन अशोक गहलोत ने इसे दिल पर ले लिया है.
राजस्थान में अशोक गहलोत ने कांग्रेस के इर्द गिर्द ऐसी बाड़बंदी कर रखी है कि उनकी मर्जी के बिना लगता है, पत्ता भी नहीं हिलने वाला. अगर अभी तक ये व्यवस्था पूरी तरह चाक चौबंद नहीं है, तो ज्यादा देर नहीं है.
अशोक गहलोत को हद में रखने की कोशिशें राहुल गांधी की तरफ से भी कोई कम नहीं हुई हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस अध्यक्ष बनने की कोशिश कर रहे थे, तो राहुल गांधी ने साफ मना कर दिया था. जयपुर लौट कर अशोक गहलोत ने मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन को बैरंग लौटा कर राहुल गांधी को भी उनकी हदें समझा दी थी. बाद में सोनिया गांधी के दरबार में हाजिर भी हुए और माफी भी मांगी, लेकिन तभी जब राजस्थान में पूरी तरह अपना जाल बिछा दिया.
अब तो अशोक गहलोत उन नेताओं को भी टिकट दिलाना चाहते हैं जिन्होंने कांग्रेस विधायक दल की बैठक के बहिष्कार का नेतृत्व किया था. जिसके लिए उनको दिल्ली मुख्यालय से नोटिस भी मिला था - और उन नेताओं को भी चुनाव लड़ना चाहते हैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं.
ऐसा लगता है, जैसे अशोक गहलोत चुनाव नतीजे आने से पहले ही पक्का बंदोबस्त कर देना चाहते हैं कि चुनाव नतीजे जो भी हों, राजस्थान कांग्रेस उनकी मुट्ठी में ही बनी रहे - और आलाकमान चाह कर भी कुछ न कर पाये.

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