
मोदी की बात मुसलमानों के बीच पहुंचने से इतना भयभीत क्यों थी सपा-कांग्रेस?
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विचारधारा की स्वतंत्रता की बातें और मोदी सरकार पर तानाशाह होने का आरोप कांग्रेस अकसर लगाती रही है. पर यूपीए शासनकाल के दौरान 2012 में नरेंद्र मोदी का एक साक्षात्कार छापने से रोकने के लिए शाहिद सिद्दीकी को न केवल धमकी दी गई बल्कि दंडित भी किया गया.
राहुल गांधी अकसर शिकायत करते हैं कि उनकी आवाज को सत्ता पक्ष लोगों तक पहुंचने से रोकता है. लेकिन, 2012 में मोदी के उर्दू अखबार को दिए एक इंटरव्यू के साथ जो हुआ, उस पर कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी शायद ही कभी जवाब दे पाए. पिछले दिनों लॉन्च हुई पूर्व सांसद और पत्रकार शाहिद सिद्दीकी की पुस्तक I, Witness: India from Nehru to Narendra Modi में कुछ ऐसे खुलासे हुए हैं जो बताते हैं यूपीए सरकार के दौरान किस तरह वैचारिक स्वतंत्रता का गला घोंटा गया. 'लल्लनटॉप' के शो किताब वाला में आए लेखक सिद्दीकी ने बताया कि किस तरह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू छापने के लिए उन पर कांग्रेस सरकार ने न केवल दबाव बनाया बल्कि धमकी भी दी. इंटरव्यू छापने की हिमाकत करने पर तो समाजवादी पार्टी से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. दरअसल कांग्रेस किसी भी कीमत पर नहीं चाहती थी कि भारतीय जनता पार्टी की रीच मुसलमानों को तक पहुंचे. कांग्रेस इसे अपनी पार्टी के लिए बहुत बड़े खतरे के रूप में देख रही थी.
क्या मुसलमानों के बीच मोदी का मैसेज पहुंचने का भय था?
नरेंद्र मोदी का 2012 में एक साक्षात्कार शाहिद सिद्दीकी ने अपने उर्दू अखबार नई दुनिया के लिए लिया था. सवाल उठता है कि क्या मुसलमानों के बीच उनके संदेश के पहुंचने का काग्रेस (मनोहन सरकार) को भय था. 2012 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री तो नहीं बने थे पर पूरे देश में एक संदेश तो जा ही चुका था कि अगले लोकसभा चुनावों में बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार वो हो सकते हैं. 2002 के गुजरात दंगों के कारण अल्पसंख्यक समुदाय, विशेष रूप से मुसलमानों के बीच मोदी को खलनायक बनाकर कांग्रेस पूरे देश के मुसलमानों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण चाहती थी.
कांग्रेस को डर था कि सिद्दीकी के साक्षात्कार के चलते मोदी के निर्दोष होने के तर्क आम मुसलमानों तक पहुंचेंगे . क्योंकि यह साक्षात्कार एक उर्दू समाचार पत्र के लिए हुआ था. साक्षात्कार में मोदी ने विकास, समावेशी शासन, और सभी समुदायों के लिए समान अवसरों की बात की. हालांकि मोदी ने 2002 के दंगों के लिए स्पष्ट माफी नहीं मांगी, बल्कि कहा कि अगर उनकी गलती साबित हो तो उन्हें सजा दी जाए.
विपक्ष को डर था कि यदि मोदी का संदेश मुस्लिम समुदाय तक प्रभावी ढंग से पहुंचा और उन्होंने इसे स्वीकार किया, तो यह बीजेपी की छवि को बदल सकता था और उनके पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित कर सकता था. सिद्दीकी समाजवादी पार्टी से जुड़े थे पर समाजवादी पार्टी के कोर वोटर भी मुसलमान ही थे. सिद्दीकी को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. पर सिद्दीकी का खुलासा यह कहता है कि उनके निष्कासन के पीछे कांग्रेस थी. क्योंकि अहमद पटेल ने सिद्दीकी के घर पहुंचकर अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें धमकाया था. इस घटना से यह पता चलता है कि विपक्ष को डर था कि मोदी का संदेश, जो विकास और समावेशिता पर केंद्रित था, मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित कर सकता था. सिद्दीकी के साक्षात्कार में मोदी ने जोर दिया कि उनकी नीतियां सभी समुदायों के लिए हैं और गुजरात में उनके शासनकाल में मुसलमानों को भी विकास योजनाओं का लाभ मिला. यह संदेश विपक्ष के उस दावे को कमजोर कर सकता था कि बीजेपी केवल हिंदू समुदाय की पार्टी है.
कांग्रेस नेतृत्व के इशारे पर होते थे सपा के फैसले?

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