
भारतीय दबदबे का नया युग! कैसे भारत की मुखर आवाज का प्रतीक बना ताजा युद्धविराम!
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भारत पाकिस्तान के बीच 2025 में हुए सीजफायर को न केवल एक संघर्ष की समाप्ति के रूप में याद किया जाएगा, बल्कि दक्षिण एशिया में एक नई रणनीतिक व्यवस्था की शुरुआत के रूप में भी याद किया जाएगा, जिसकी रचना वाशिंगटन या मॉस्को ने नहीं, बल्कि नई दिल्ली ने की है.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की पहल पर हुए युद्ध विराम के समझौते को रणनीतिक एक्सपर्ट भारत के सामरिक और कूटनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण कह रहे हैं. पाकिस्तान के साथ हुआ 2025 का युद्धविराम का समझौता जो पूरी तरह से भारत की शर्तों पर हुआ है, उसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है.
सरकारी सूत्रों ने आजतक को बताया, "युद्धविराम न केवल शत्रुता की समाप्ति का प्रतीक है, बल्कि यह भारत के रक्षा सिद्धांत में एक बड़े बदलाव को भी औपचारिक रूप देता है, जो दक्षिण एशिया की अस्थिर पावर डायनामिक में एक नई मिसाल कायम करता है. पिछले युद्ध विरामों के विपरीत, जो बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय दबाव या समझौतों से प्रभावित थे, यह समझौता भारत की बढ़ती मुखरता और वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है."
सीजफायर का इतिहास
वर्तमान समझौते के महत्व को समझने के लिए भारत और उसके शत्रुओं के बीच पिछले युद्ध विरामों के ऐतिहासिक संदर्भ की जांच करना महत्वपूर्ण है.
1949: विभाजन के बाद पहला युद्ध विराम कराची समझौते के तहत अमेरिका की भागीदारी से हुआ था. इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र निगरानी समूह की स्थापना हुई, इस युद्धविराम की शर्तें काफी हद तक बाहरी शक्तियों से प्रभावित थीं.
1965: भारत-पाक युद्ध के बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 211 ने शांति के लिए जोर दिया, जिसका समर्थन अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने किया. ताशकंद घोषणापत्र के तहत भारत ने पाकिस्तान के साथ सैन्य मुठभेड़ के दौरान हासिल की गई सभी रणनीतिक जीत पाकिस्तान को वापस कर दीं

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