
बंगाल का 'M-फैक्टर'... 75 सीटें TMC की झोली में, उतनी ही दीदी के जादू भरोसे!
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पश्चिम बंगाल की सत्ता की कुर्सी का रास्ता अल्पसंख्यकों मोहल्लों से होकर गुजरता है. और ममता बनर्जी ने इस बात को न सिर्फ समझा है, बल्कि पिछले 15 सालों में इसी से अपनी सत्ता के किले को चुनाव दर चुनाव मजबूत बनाया है. आज जब 2026 के विधानसभा चुनाव करीब हैं, तो ममता का मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत नजर आता है.
‘हम हैं, इसीलिए आप सब सुरक्षित हैं. और अगर हम किसी दिन न रहे, अगर ऐसा दिन कभी आया, तो एक सेकंड लगेगा... जब एक समुदाय एकजुट होता है और घेर लेता है, तो एक सेकंड में '12 बजा देगा' (खत्म कर देगा). अगर आप अपना '13' नहीं बजवाना चाहते (अपना नुकसान नहीं चाहते), तो बीजेपी के इस दुष्प्रचार में गलती मत करना.’ -ममता बनर्जी (SIR विरोध में हुई मुसलमानों की एक सभा को संबोधित करते हुए)
ममता बनर्जी के इस ताजा बयान को तुष्टिकरण कहकर कांग्रेस और लेफ्ट भले कितनी ही आलोचना कर रहे हों. बीजेपी कितनी ही छाती पीट रही हो. ममता और टीएमसी को फर्क नहीं पड़ता. बंगाल चुनावों में मुस्लिम फैक्टर लंबे अरसे टीएमसी के लिए ट्रंप कार्ड बना हुआ है. और इस बार भी उसकी कोई काट नहीं दिखती. यह इसलिए दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक पॉलिटिक्स देशभर में असर खो बैठी है, सिवाय पश्चिम बंगाल के. 2011 से इस सूबे की सत्ता पर काबिज ममता ने ऐसा जादू चलाया है कि उन्हें बहुमत के लिए राज्य की महज 25 फीसदी सीटों पर मेहनत करनी होती है. बाकी 25 फीसदी (मुस्लिम बहुल आबादी वाली) सीटें वैसे ही झोली में आ गिरती हैं. बंगाल में मुसलमानों की आबादी 27 फीसदी है.
2011 से पहले बंगाल का मुस्लिम वोटर मुख्य रूप से लेफ्ट फ्रंट (वामपंथियों) और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ था. ममता ने इसे दो हिस्सों में छीना. 2011 के चुनाव से पहले सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को हथियार बनाया. उन्होंने बार-बार कहा कि 34 साल के लेफ्ट राज में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो गई है. वे धीरे-धीरे मुसलमानों की आवाज बनीं. फिर आया सिंगूर-नंदीग्राम का घटनाक्रम. इन आंदोलनों में मारे गए या विस्थापित हुए लोगों में बड़ी संख्या मुस्लिम किसानों की थी. उनके साथ खड़ी हुईं और खुद को उनका 'रक्षक' साबित किया. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और लेफ्ट का कैडर धीरे-धीरे टीएमसी में शिफ्ट हो गया. उसके बाद मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी की हरियाली ममता की नीतियों, बयानों और उनके रणनीतिक झुकाव की देन है.
योजनाएं, इंवेट और भरोसा: दीदी का 'जादू'
ममता ने सिर्फ भाषण नहीं दिए, उन्होंने जमीनी स्तर पर ऐसी योजनाएं लागू कीं जिससे मुसलमानों का सीधा जुड़ाव पैदा हुआ. 2012 में इमामों के लिए मासिक भत्ते की शुरुआत करना एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था. हालांकि इस पर काफी विवाद हुआ, लेकिन इसने मुसलमानों के मजहबी नेतृत्व के बीच ममता की साख पक्की कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने मदरसा आधुनिकीकरण का कार्यक्रम शुरू किया और छात्रवृत्ति: 'ऐक्यश्री' जैसी स्कॉलरशिप और कन्याश्री का लाभ मुस्लिम लड़कियों तक जमकर पहुंचाया. 2026 के चुनाव में जाने से पहले ममता ने अंतरिम बजट में माइनॉरिटी अफेयर्स के नाम पर 5713 करोड़ रुपए अलॉट किए. इससे मुस्लिम समाज के भीतर एक नया मध्यम वर्ग तैयार हुआ है, जो टीएमसी का कट्टर समर्थक है.
इफ्तार और हिजाब: ममता का सिर पर पल्लू रखकर इफ्तार पार्टियों में जाना या मंच से दुआएं पढ़ना महज 'इवेंट' नहीं था. यह उस समुदाय को सम्मान (Dignity) देने का तरीका था, जिसे बीजेपी 'तुष्टीकरण' कहती है. मुस्लिम वोटर को लगा कि पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके रिवाजों को खुलकर अपना रही है. कई मौके ऐसे आए, जब हिंदू और मुस्लिम त्योहारों पर सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ. ऐसे समय में ममता पर भले आरोप लगे हों कि उन्होंने मुस्लिम पक्ष की तरफ झुकाव रखा, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

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