
प्रॉस्टिट्यूट, छेड़खानी, हाउसवाइफ... जेंडर स्टीरियोटाइप से जुड़े 43 शब्दों को हटाने के पीछे की कहानी
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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने लैंगिक समानता बढ़ाने और महिलाओं के साथ न्यायिक क्षेत्र में भेदभाव दूर करने की पहल की है. अब सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और दलीलों में 'जेंडर स्टीरियोटाइप' शब्दों का इस्तेमाल नहीं होगा. कोर्ट का कहना है कि संविधान सभी को समान अधिकारों की गारंटी देता है. महिलाएं ना तो पुरुषों के अधीन हैं और ना उन्हें किसी के अधीन होने की जरूरत है.
सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक भेदभाव पर नकेल कसने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. बुधवार को SC की तरफ से एक हैंडबुक जारी की गई है. इस हैंडबुक का नाम 'कंबैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' दिया है. इसमें कोर्ट ने न्यायिक आदेशों और फैसलों में महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी और गलत सोच दर्शाने वाली भाषा का इस्तेमाल ना करने के बारे में विस्तार से बताया है. साथ ही महिलाओं के पहनावे और उनके यौन संबंधों के इतिहास के आधार पर अवधारणा बना लेने को भी गलत ठहराया है. सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को लेकर गरिमापूर्ण भाषा का उपयोग करने की सलाह दी है और कहा- रूढ़िवादी सोच को बदलना होगा. जानिए SC की हैंडबुक की 10 बड़ी बातें...
सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए प्रयोग होने वाले आपत्तिजनक शब्दों पर रोक लगाने के लिए हैंडबुक लॉन्च की है. इसमें 43 रूढ़िवादी शब्दों और करीब इतने ही असम्मानजनक वाक्यांश और पूर्वाग्रह वाले वाक्यों का इस्तेमाल ना करने के बारे में निर्देश दिया गया है. साथ ही उन शब्दों की जगह वैकल्पिक शब्दों और भाषा का सुझाव दिया है. यह हैंडबुक देशभर के जजों और कानून से जुड़े लोगों को समझाने और महिलाओं के प्रति गलत शब्दों के इस्तेमाल से बचने की सलाह देती है.
1. किस कमेटी ने तैयार की हैंडबुक?
इस हैंडबुक को कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य की अध्यक्षता वाली समिति ने तैयार की है. इस समिति में रिटायर्ड जस्टिस प्रभा श्रीदेवन और जस्टिस गीता मित्तल और प्रोफेसर झूमा सेन भी शामिल हैं. प्रोफेसर सेन फिलहाल कोलकाता में वेस्ट बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज में फैकल्टी मेम्बर हैं.
2. किन शब्दों का इस्तेमाल करने पर मनाही?

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