
पराली जलाने के लिए पंजाब के किसानों का 'पोखरण प्लान'... NASA के सैटेलाइट को ही दे रहे हैं चकमा?
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एक्सपर्ट्स आशंका जता रहे हैं कि कहीं किसान निगरानी तंत्र को चकमा देकर तो पराली नहीं जला रहे हैं? इसके लिए वह कोई मामूली तरीका नहीं अपना रहे, बल्कि इतने हाइटेक स्टेप ले रहे हैं कि वह सीधे सैटेलाइट को ही चकमा दे रहे हैं. इन नए हथकंडों ने पराली प्रबंधन और निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
साल था 1998. भारत के पोखरण में कुछ लोग जुटे. एक पूरी टीम जिस मिशन के लिए जुटी थी, उसे पूरा होने तक गुप्त रखना सबसे बड़ी चुनौती थी. भारत परमाणु परीक्षण कर रहा था, लेकिन दुनिया की निगाहों से बचकर. इसके लिए इस मिशन में शामिल वैज्ञानिक टीम ने एक प्लान बनाया. प्लान था कि, अमेरिकी सैटेलाइट्स की सतर्क निगरानी के बावजूद, भारत ने परीक्षण स्थल पर एक्टिविटी को ऐसे छिपाया कि, रेगिस्तानी इलाका सामान्य नजर आए. वैज्ञानिकों और सैनिकों ने मजदूरों जैसा भेष अपनाया, उपकरणों को बालू से ढका गया, और सैटेलाइट के ऑर्बिटल शेड्यूल की स्टडी कर अधिकतर कार्य रात में किए गए. नतीजा, भारत परमाणु शक्ति बन गया और अमेरिका व अन्य देश देखते रह गए.
क्या पराली जलाने के लिए सैटेलाइट को चकमा दे रहे हैं किसान? 26 साल पुरानी इस बात का जिक्र आज भी जब होता है तो हम गौरव का अनुभव करते हैं, लेकिन आज जिस सिलसिले में इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र हो रहा है, वह सीधे आम आदमी से जुड़ी है, हमसे और आपसे जुड़ी है, हमारी सांसों से जुड़ी है. नासा के एक वैज्ञानिक का दावा है, पराली जलाने के लिए किसान उसी 'पोखरण प्लान' के तहत ही काम कर रहे हैं. लेकिन यह कोई गर्व की बात नहीं बल्कि शर्मनाक है.
एक्सपर्ट्स आशंका जता रहे हैं कि कहीं किसान निगरानी तंत्र को चकमा देकर तो पराली नहीं जला रहे हैं? इसके लिए वह कोई मामूली तरीका नहीं अपना रहे, बल्कि इतने हाइटेक स्टेप ले रहे हैं कि वह सीधे सैटेलाइट को ही चकमा दे रहे हैं. इन नए हथकंडों ने पराली प्रबंधन और निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
NASA के वैज्ञानिक ने किया विश्लेषण राजधानी दिल्ली गैस चैंबर बनी हुई है. NCR और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच चुका है. 'सांसों का ये आपातकाल' कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा रहा है. इस गंभीर स्थिति के बीच एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है पराली. किसानों द्वारा पराली जलाने को प्रदूषण का बड़ा कारण माना जा रहा है. हालांकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल पराली जलाने की घटनाएं घटी हैं, लेकिन प्रदूषण का स्तर जस का तस बना हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों ने पराली जलाने के समय में बदलाव किया है ताकि सैटेलाइट के जरिए उनकी एक्टिविटी का पता न लगाया जा सके. TOI में पब्लिश हुई एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. यह दावा नासा वैज्ञानिक हीरेन जेठवा के विश्लेषण पर आधारित है.
सैटेलाइट के मूविंग टाइम को समझ कर अंजाम दे रहे करतूत नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक हीरेन जेठवा ने सोशल मीडिया पर अपना एनालिसिस शेयर किया है. वह बीते महीनों से इस पर काम कर रहे थे. इसी क्रम में 25 अक्टूबर को उन्होंने X पर लिखा, 'क्या उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान के किसान सैटेलाइट के मूविंग टाइम पर पराली जलाने से बच रहे हैं? GEO-KOMPSAT 2A सैटेलाइट के डेटा से दोपहर बाद के दौरान धुएं के गुबार देखे गए हैं. इस फैक्ट की जमीनी हकीकत की जांच की जानी चाहिए.
किस समय भारत-पाकिस्तान से गुजरती है सैटेलाइट जेठवा का कहना है कि नासा और NOAA के सैटेलाइट दोपहर 1:30 से 2:00 बजे के बीच भारत और पाकिस्तान के ऊपर से गुजरते हैं. उनका अनुमान है कि किसान संभवतः इस समय के बाद पराली जला रहे हैं, ताकि उनकी ये एक्टिविटी रिकॉर्ड में न आ सकें. उन्होंने साउथ कोरिया के GEO-KOMPSAT-2A सैटेलाइट के डेटा का हवाला देते हुए कहा कि यह सैटेलाइट हर 10 मिनट पर डेटा रिकॉर्ड करता है और उसमें दोपहर बाद के समय में आग जलने की घटनाएं ज्यादा देखी गईं.

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