
न नारेबाजी...न शोरगुल... क्या है नीतीश की 'खामोशी' का संकेत, आखिरी जोरदार पारी या फेयरवेल?
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बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और इस बार का माहौल थोड़ा अलग दिख रहा है. नितीश कुमार अब शोर-शराबे वाली रैलियों की जगह शांत और सोच-समझकर चुनावी अभियान चला रहे हैं. उनकी ताकत कहीं बाहर नहीं बल्कि लोगों के बीच उनके काम और भरोसे में छिपी हुई है.
,बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और जो माहौल अब है, वो पुरानी राजनीति की याद दिलाता है. साथ ही इस बार कुछ बदलता हुआ भी दिख रहा है. साल 2015 में 'फिर एक बार, नीतीश कुमार' नारा छाया हुआ था. उस चुनाव ने नीतीश को बिहार का अटल नेता बना दिया था जो स्थिरता और विकास का प्रतीक माने जाते हैं.
अब 2025 का चुनाव कुछ अलग है. अब ज्यादा जोरदार रैलियों की जगह शांत और सोच-समझकर चलाए जा रहे अभियानों ने जगह बना ली है. गांवों और छोटे शहरों में JD(U) के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों से मिल रहे हैं. ऐसा लगता है कि यही नीतीश का 'छिपा हुआ फायदा' है. जहां विपक्ष शोर मचाकर वोट मांग रहा है, वहीं नीतीश की पहले के कार्यकाल की छवि और भरोसा अभी भी लोगों के दिमाग में है.
महिलाओं में नीतीश की ताकत
नीतीश की सबसे बड़ी ताकत बिहार की महिलाओं में है. उनकी योजना मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना (MMRY) के तहत अब तक 10 लाख से ज्यादा महिलाओं को प्रति महिला 10,000 रुपए दिए जा चुके हैं. कुल 10,000 करोड़ रुपए का लक्ष्य है ताकि महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें. इसके अलावा सरकार ने 11 लाख स्वयं सहायता समूह बनाए हैं जिनमें 1.40 करोड़ महिलाएं शामिल हैं.
गौरतलब है कि साल 2006 में बिहार ने पंचायती राज संस्थाओं में 50% महिलाओं के लिए आरक्षण दिया. 2013 में पुलिस सेवाओं में 35% महिलाओं को आरक्षित किया गया. इन कोशिशों ने महिलाओं को वोट बैंक के रूप में मजबूत किया. इसलिए हर चुनाव में महिलाओं की उपस्थिति नीतीश के लिए फायदेमंद रही है.
बाइक पर लड़कियां और एजुकेशन...

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