
नीतीश की मांग, PM मोदी का ऐलान... 5 साल तक डबल इंजन की सरकार से बिहार को क्या-क्या मिला?
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बिहार की राजनीति के लिए अर्थव्यवस्था कभी बड़ा इश्यू नहीं रहा है. चेहरों पर लड़े जाने वाले चुनाव में अपराध, जाति, भ्रष्टाचार आदि ही हावी रहते आए हैं. पिछले कुछ दशक में तो बिहार की राजनीति जंगलराज बनाम सुशासन के बहस पर केंद्रित रहते आई है. फिर भी गहराई में जाकर खोजें तो आर्थिक लिहाज से विशेष राज्य का दर्जा और स्पेशल पैकेज की मांग ये दो मुद्दे निकलकर सामने आते हैं.
Bihar Politics: राजनीति कहीं की भी हो, होती दिलचस्प है. राजनीतिक बिसात पर शह-मात का खेल भले ही हमेशा सामने से दिखाई नहीं देता हो, लेकिन पृष्ठभूमि में पटकथा के मंचन का अभ्यास लगातार जारी रहता है. इसी कारण कहावत भी प्रचलित है कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है. बिहार की राजनीति में यह कहावत एक बार फिर से चरितार्थ हुई है. प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Bihar CM Nitish Kumar) और उनकी पार्टी ने एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ ब्रेकअप कर लिया है. नीतीश कुमार अब अपने धुर-विरोधी लालू यादव (Lalu Prasad Yadav) की पार्टी राजद (RJD), कांग्रेस (Congress) और वाम दलों (Left Parties) के साथ मिलकर नई सरकार का गठन करने जा रहे हैं. इससे पहले पिछले पांच साल से राज्य में भाजपा और जदयू गठबंधन (BJP JDU Allaince) की सरकार चल रही थी, जिसे डबल इंजन की सरकार (Double Engine Kii Sarkar) का नाम दिया गया था. आइए आर्थिक लिहाज से ये जानने का प्रयास करते हैं कि पिछले पांच साल बिहार के लिए कैसे रहे और राज्य के लोगों के ऊपर डबल इंजन की सरकार का क्या असर हुआ...
साथ-साथ शुरू हुआ राजनीति का सफर
आर्थिक आंकड़ों की बातें करने से पहले पिछले कुछ सालों के दौरान बिहार की राजनीति के कुछ प्रमुख घटनाक्रमों को समझ लेते हैं. बिहार की राजनीति के पिछले 3-4 दशक में दो प्रमुख चेहरे ही मुख्य तौर पर छाए रहे हैं और ये दो चेहरे हैं लालू यादव व नीतीश कुमार के. कालांतर में एक-दूसरे के धुर-विरोधी बन जाने से पहले ये दोनों नेता कभी कंधे-से-कंधे मिलाकर चला करते थे. लालू यादव और नीतीश कुमार ने लगभग साथ-साथ राजनीतिक करियर की शुरूआत की. इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान पूरे देश में आपातकाल लगाया गया था, जिसके खिलाफ ऐतिहासिक जेपी आंदोलन (JP Movement) हुआ था. इसी आंदोलन ने लालू और नीतीश समेत कई नेताओं की राजनीति को आधार प्रदान किया. बिहार के ये दोनों दिग्गज नेता उस समय से साथ-साथ राजनीति में आगे बढ़ते रहे.
इस तरह पाला बदलते रहे नीतीश कुमार
लालू यादव जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तो उस समय नीतीश कुमार उनके सबसे करीबी व विश्वस्त सहयोगी माने जाते थे. नीतीश कुमार लालू यादव को अपना बड़ा भाई बताते थे, जबकि लालू यादव नीतीश को अपना छोटा भाई बोलते थे. हालांकि दोनों मुंहबोले भाइयों का रिश्ता लंबा नहीं चला और साल 1994 में नीतीश कुमार बागी हो गए. उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस समेत कई समाजवादी नेताओं के साथ मिलकर समता पार्टी (Samta Party) का गठन किया, जिसका नाम बाद में बदलकर जदयू (JDU) कर दिया गया. साल 1998 में नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ पहली बार गठबंधन किया और अटल बिहारी वाजपेयी की तत्कालीन सरकार में रेल मंत्री समेत कई मंत्रालयों को संभाला. यह गठबंधन करीब 15 साल चला और साल 2013 में नीतीश इससे अलग हो गए. तब उन्होंने राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई और महागठबंधन के बैनर तले 2015 का विधानसभा चुनाव जीते. इसके तहज दो साल बाद ही यानी 2017 में नीतीश राजद से भी अलग हो गए और दोबारा भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली. साल 2020 में हुए आखिरी विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू साथ में उतरीं और उन्हें जीत भी मिली. अब पिछले करीब 05 साल के दौरान भाजपा के साथ सरकार चलाने के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर से अलग हो चुके हैं.
पांच साल में डबल हुई बिहार की जीडीपी

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