
ट्रंप-मोदी की दोस्ती क्या पुतिन बर्दाश्त कर पाएंगे या बनेंगे नए समीकरण? | Opinion
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डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद चीन को घेरने की कोशिश होना तो तय है. दूसरे क्वाड को मजबूत बनाने की कोशिश और तेज होगी. जाहिर है कि दोनों ही मामलों में भारत केंद्र में होगा. क्या भारत को सहयोग की नई जिम्मेदारियां सौंपकर भूमिका अच्छी लगेगी?
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद फिर से यह कयासबाजी शुरू हो गई है कि क्या भारत और अमेरिका की दोस्ती परवान चढ़ेगी? ट्रंप का पहले कार्यकाल पर नजर डालें तो पता चलता है कि उनके नजर में भारत की अहमियत कुछ ज्यादा ही थी. हालांकि इसके पीछे बहुत से कारण थे पर कूटनीति यही होती है. बिना फायदे के कोई देश किसी भी देश से संबंध नहीं रखता है. आज भारत अमेरिका के लिए चाहे व्यापार के दृष्टिकोण से या सामरिक और वैश्विक संतुलन के नजरिए से देखे अमेरिका के लिए जरूरी बन चुका है. पर भारत के साथ मुश्किल यह है कि अमेरिका से जितना संबंध मजबूत होगा, भारत अपने सबसे पुराने दोस्त रूस उससे उतना ही दूर होगा. पिछले कुछ सालों में जैसी परिस्थितियां बन रही हैं उसके हिसाब से भारत के लिए अब अपनी कूटनीति में बदलाव की जरूरत भी महसूस की जा रही है. रूस और चीन दिन प्रतिदिन एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं. दोनों की दोस्ती विश्व की कूटनीति पर प्रभावी होती जा रही है. अमेरिका भी भारत को इसलिए ही महत्व दे रहा है कि क्योंकि रूस और चीन दोनों एक हो चुके हैं.
1-ट्रंप और मोदी के रिश्ते उम्मीद जगाते हैं
ट्रंप ने हालांकि अपने पहले कार्यकाल के अंतिम वर्ष 2020 में भारत की यात्रा की थी. पर पीएम मोदी से उनकी 4 साल के कार्यकाल में कुल तीन बार मुलाकात हुई. इसके साथ ही हर मुलाकात भारत-अमेरिकी रिश्तों के लिहाज से मील के पत्थर साबित हुई थी. साबित यही हुआ था कि उस दौर में भारत अमेरिका के कितना निकट पहुंच गया था. मोदी और ट्रंप की पहली मुलाकात जून, 2017 में हुई थी. कुछ महीने पहले ही राष्ट्रपति बने ट्रंप ने मोदी को व्हाइट हाउस में रात्रि भोज पर आमंत्रित किया.
इतना ही नहीं ट्रंप ने अपने कार्यकाल में सबसे पहले व्हाइट हाउस में रात्रि भोज करने का निमंत्रण दिया. इस तरह ट्रंप के कार्यकाल में मोदी पहले वैश्विक नेता बन गए. दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद जारी संयुक्त बयान में सीमा पार आतंकवाद समेत हर तरह के आंतकवाद के खिलाफ भारत व अमेरिका ने बेहद सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया और सीधे तौर पर पाकिस्तान को चेतावनी दी गई. यह पहली बार था जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति खुलकर पाकिस्तान के खिलाफ भारत का साथ दे रहा था. ट्रंप ने खुद कहा कि भारत व अमेरिका के बीच ऐसे मजबूत संबंध पहले कभी नहीं रहे. इसके कुछ ही महीने बाद अमेरिका व भारत के बीच टू-पल्स-टू वार्ता शुरू करने की सहमति बनी.
मोदी ने दूसरी यात्रा अगस्त 2019 में जम्मू व कश्मीर से धारा 370 हटाने के कुछ ही हफ्तों बाद की थी. भारत को इस बात की चिंता थी कि कहीं अमेरिका व दूसरे पश्चिमी देश इस फैसले के खिलाफ कोई कड़वी बात न कहें पर ऐसान कुछ नहीं हुआ. इसके बाद अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष ट्रंप भारत आए. पर दुबारा राष्ट्रपति न बनने के चलते ये भारत-अमेरिका का रिश्ता परवान चढ़ने से रह गया.
2-रूस के सबसे खास दोस्त चीन को चपत लगाने का कोई मौका नहीं गवाएंगे ट्रंप

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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