
भारत संग डील... कनाडा और EU ने बढ़ा दिया ट्रंप का सिरदर्द, भरोसेमंद नहीं रहा अमेरिका!
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भारत-ईयू के बीच की डील को मदर ऑफ ऑल डील कहा जाना महज अलंकार नहीं है. भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक GDP का 25 फीसदी प्रतिनिधित्व करते हैं और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इन्हीं के खाते में आता है.
दशकों तक जिन देशों की अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका पर निर्भर रही हैं, वे अब व्हाइट हाउस में बैठे उस शख्स से निपटने की रणनीतियां बनाने में जुटे हैं. ट्रंप की टकरावपूर्ण कूटनीति और टैरिफ को हथियार बनाने की रणनीति ने मित्र देशों तक को अलग-थलग कर दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचा दी है. लेकिन इस हफ्ते यूरोप और कनाडा ने ट्रंप को टका सा जवाब दे दिया है. लेकिन दिलचस्प ये है कि ट्रंप को आईना दिखाने की इस स्ट्रैटेजी के केंद्र में भारत है.
यूरोपीय संघ (EU) ने भारत के साथ जिस मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील पर साइन किए हैं. उससे ट्रंप को कड़ा झटका लगा है. अमेरिका को अब यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि उसकी जोर-जबरदस्ती वाली व्यापार नीति और टैरिफ ने उसे एक असहज स्थिति में ला खड़ा किया है, ठीक ऐसे समय में जब वैश्विक आर्थिक गठबंधन तेजी से नए सिरे से आकार ले रहे हैं.
भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बयान से पता चलता है कि अमेरिका अब खुद को कितना अलग-थलग महसूस कर रहा है. उन्होंने कहा कि मुझे यूरोपीय लोग बेहद निराशाजनक लगते हैं. वे हमारे साथ आने को तैयार नहीं थे क्योंकि वे यह व्यापार समझौता करना चाहते थे.
ट्रंप प्रशासन के इस शीर्ष अधिकारी ने यूरोप पर यह आरोप भी लगाया कि उसने यूक्रेन युद्ध से ऊपर व्यापारिक हितों को रखा. भारत के रूस के साथ घनिष्ठ संबंधों और रूसी तेल की खरीद का हवाला भी दिया. लेकिन बेसेंट शायद इस स्याह सच्चाई को नजरअंदाज कर गए कि कोई भी देश धमकाया जाना या किसी अनिश्चित साझेदार पर निर्भर रहना पसंद नहीं करता. यही अविश्वास और ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियां यूरोपीय संघ के लिए भारत के साथ उस व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की एक बड़ी वजह बनीं, जिस पर लगभग दो दशकों से बातचीत चल रही थी.
दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने ट्वीट कर कहा कि ट्रंप फैक्टर ने साफ तौर पर वर्षों की बातचीत के बाद उन्हें फिनिश लाइन पार करने में मदद की. यह सिर्फ अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने की बात नहीं है, बल्कि एक व्यापक तेजी से बढ़ती साझेदारी को मजबूत करने का संकेत भी है.
लेकिन भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

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