
ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी विवाद: वो दलीलें, जिनसे मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट हुआ तैयार
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वाराणसी जिला अदालत ने श्रृंगार गौरी-ज्ञानवापी मस्जिद मामले को सुनवाई के योग्य मान लिया है. कोर्ट ने अपने 26 पेज के फैसले में मान लिया है कि यह मामला उपासना स्थल कानून 1991 के दायरे से बाहर है. कोर्ट में सुनवाई के दौरान हिंदू महिलाओं की याचिका पर उनकी ओर से वकील हरिशंकर जैन ने दलीलें रखी थीं.
वाराणसी के श्रंगार गौरी-ज्ञानवापी मस्जिद मामले में जिला जज की अदालत ने याचिका को सुनवाई योग्य माना है. कोर्ट ने अपने 26 पेज के फैसले में मान लिया कि याचिकाकर्ता महिलाओं का दावा उपासना स्थल कानून 1991 के दायरे से बाहर है. तभी तो इस कानून से जुड़े आईसीसी यानी इंडियन सिविल कोड के नियम 7 (11) के दायरे में ये नहीं आता. अब इस मामले में 22 सितंबर को सुनवाई होगी.
हिंदू महिलाओं की याचिका पर उनकी ओर से हरिशंकर जैन ने दलील रखी कि ये मामला कानून में वर्णित अयोध्या मामले की छूट वाले दायरे में नहीं है, लेकिन अपनी प्रकृति और प्रमाणिक सत्यता की वजह से ये इस कानून के दायरे से बाहर है क्योंकि यहां 15 अगस्त 1947 की बात तो छोड़ ही दी जाए 1993 तक श्रृंगार गौरी की पूजा होती रही है. श्रृंगार गौरी, काशी विश्वनाथ के चारों ओर मौजूद शक्ति की प्रतीक नौ गौरियों में से एक हैं. इनका स्थान वहीं है जहां ज्ञानवापी मस्जिद की दीवार का एक कोना है.
ज्ञानवापी के तहखाने में होती थी पूजा
अदालत के सवाल पर याचिकाकर्ताओं ने ये प्रमाण भी प्रस्तुत कर दिया कि 2021 तक साल में एक दिन चैत्र नवरात्र की चतुर्थी को माता श्रृंगार गौरी की पूजा का अधिकार हिंदुओं को है. इसके अलावा ये भी दावा किया गया कि पिछली सदी के अंतिम दशक तक व्यास परिवार का ज्ञानवापी के तहखाने में स्थित देव प्रतिमाओं की पूजा के लिए आना जाना था.
मेरिट पर होगी मुकदमे की सुनवाई
कोर्ट ने अपने फैसले में इन दावों का जिक्र करते हुए उनकी सत्यता पर भरोसा भी किया है. अब इस फैसले से ये तो तय हो गया कि सदियों पुराने इस विवाद पर सुनवाई जारी रहेगी यानी अब मेरिट पर मुकदमा सुना जाएगा.

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