
'जाति' को जाना ही होगा... यूपी में शुरू हुई मुहिम से किसे ऐतराज होगा?
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'जातिवाद' को बढ़ावा देने वाले सभी आयोजनों और प्रतीकों पर रोक लगाने का फैसला लिया है. जिसका आधार इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक आदेश है. बहस, इस बात पर है कि क्या सरकारी आदेश से जातिवाद की जड़ों को उखाड़ा जा सकता है? क्या जातियों की खुराक पाकर खड़ी हुई पार्टियां इस मुहिम से जुड़ेंगी?
डॉ. भीमराव अंबेडकर समाज में जातिवाद के जहर को मिटाने और समानता लाने के लिए 'annihilation of caste' यानी जातियों के खात्मे की बात करते हैं. जातिवाद की नहीं, सीधे जातियों के खात्मे की वकालत. जयप्रकाश नारायण कहते हैं कि 'जब जाति खत्म होगी तभी संपूर्ण क्रांति होगी.' नतीजे में उस दौर के कई युवा अपने नाम के आगे से जातिसूचक उपनाम हटा लेते हैं. ऐसे प्रयासों के बावजूद बदलता कुछ नहीं. बल्कि जेपी के समाजवादी आंदोलन से जुड़े नेता एक-एक जाति पकड़कर अपनी राजनीति चमका लेते हैं. ऐसे में समाज से जातिवाद के जहर को मिटाने के लिए ताजा पहल उत्तर प्रदेश में हुई है.
उत्तर प्रदेश, जहां की राजनीति सदियों से जाति के इर्द-गिर्द घूमती रही है, अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 22 सितंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया, जिसमें प्रदेश में जातिगत रैलियों, जाति-आधारित राजनीतिक सभाओं और सार्वजनिक स्थानों पर जाति-प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है. इस आदेश का आधार इलाहाबाद हाईकोर्ट का हालिया फैसला है, जिसने जातिगत वैमनस्य को 'राष्ट्र-विरोधी' करार दिया. कोर्ट ने पुलिस रिकॉर्ड्स, एफआईआर, वाहनों पर स्टीकर्स और साइनबोर्ड्स से जाति का उल्लेख हटाने का निर्देश दिया है. यह कदम न केवल कानूनी है, बल्कि समाज में फैलते जातिगत विद्वेष को जड़ से मिटाने का प्रयास भी. लेकिन सवाल उठता है- क्या यह रोक वास्तव में प्रभावी होगी? क्योंकि समाज में जाति से उपजे वैमनस्य को दूर करने के लिए डॉ. अंबेडकर से जय प्रकाश नारायण तक कई प्रभावशाली लोगों ने प्रयास किए, लेकिन वह समाधान नहीं मिला, जिसकी समाज को उम्मीद थी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: जाति को 'राष्ट्र-विरोधी' घोषित करना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले में जाति-प्रथा की कड़ी आलोचना की. कोर्ट ने कहा कि पुलिस दस्तावेजों में आरोपी की जाति का उल्लेख पूर्वाग्रह को बढ़ावा देता है और संविधान के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है. हाईकोर्ट ने जाति-गौरव को 'झूठा घमंड' बताते हुए इसे राष्ट्र की एकता के लिए खतरा माना. इसके आधार पर योगी सरकार ने तुरंत कार्रवाई की.
यूपी सरकार के आदेश में शामिल हैं: जातिगत रैलियों पर रोक, वाहनों पर जाति-चिह्न हटाना, पुलिस स्टेशनों के नोटिस बोर्ड से जाति कॉलम मिटाना, और सोशल मीडिया पर जाति-प्रचार या नफरत फैलाने वाले कंटेंट पर कार्रवाई. अपवाद केवल एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के मामलों में है. यह आदेश सभी जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को भेजा गया है.
विपक्ष ने इस आदेश को 'कॉस्मेटिक' और 'आंखों में धूल झोंकने वाला' बताया है. समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि 5000 सालों के जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए सिर्फ आदेश काफी नहीं, बल्कि सोच बदलनी होगी. भाजपा के सहयोगी भी चिंतित हैं, क्योंकि यह आदेश उनकी राजनीतिक रणनीति पर असर डाल सकता है. फिर भी, कई लोग इसे सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जो जाति की जड़ों को कमजोर करेगा.

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