
जहां नहीं खिसक रही थी मिट्टी, वहां टूट रहे पहाड़... क्या नैनीताल में आने वाली है बड़ी आपदा?
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किसी इमारत की नींव और दीवारें ही उसे बचा कर रखती हैं. नैनीताल अगर इमारत है तो बलियानाला उसकी नींव. तीन तरफ पहाड़ियां उसकी दीवारें. पहले सिर्फ बलियानाला से भूस्खलन, धंसाव की खबरें आती थीं. अब तो नैनीताल की दीवारों से भी लैंडस्लाइड हो रहा है. पहाड़ियां टूट रही हैं. किसी भी समय यहां बड़ी आपदा आ सकती है. नैनीताल खतरे में है... पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट.
एक अंग्रेज भूगर्भ शास्त्री मिडल मिस ने 19वीं सदी में नैनीताल का सर्वे किया था. उसने कहा था कि अगर मुझे नैनीताल के संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित करना पड़े तो तय है कि मुझे गालियों की बौछार झेलनी पड़ेगी, क्योंकि मिट्टी तब भी खिसक रही थी, अब भी खिसक रही है. तब समस्या कम थी लेकिन अब बहुत ज्यादा...
नैनीताल तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी है. ऊपर मल्लीताल की तरफ नैना पीक. एक तरफ अयारपाटा और एक तरफ शेर का डांडा पहाड़ी. नीचे तल्लीताल की तरफ शहर की नींव बलियानाला. अब बलिया नाले के साथ-साथ इन तीनों पहाड़ियों में भूस्खलन हो रहा है. ये नैनीताल के लिए अच्छा संकेत नहीं है. भूवैज्ञानिक बताते हैं की नैनीताल की भार सहने की क्षमता खत्म हो चुकी है. अगर यहां किसी भी तरह का निर्माण पूरी तरह से नहीं रोका गया है तो शहर धंस जाएगा.
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बलियानाला पांच दशकों से धंस रहा है... इलाज कुछ भी नहीं
बलिया नाला क्षेत्र में 1972 से लगातार भूस्खलन हो रहा है. इसके बावजूद भी सरकार इस क्षेत्र में हो रहे भूस्खलन को रोकने में असफल रही है. बलियानाला ही नैनीताल की बुनियाद है जो सालों से धंस रहा है. आज तक वैज्ञानिक तरीके से इसका कोई उपचार नहीं किया गया. अगर यह धंसा तो पूरा नैनीताल धंस जाएगा.
भूस्खलन से अब तक कई घर बलिया नाले में समा चुके हैं. अब इस भूस्खलन ने राजकीय इंटर कॉलेज तल्लीताल की सीमा को छू लिया है. यह आबादी तक पहुंच गया है. नैनीताल की तरफ बढ़ने लगा है. नाले में साल 1867 में सबसे पहले भूस्खलन का रिकॉर्ड उपलब्ध है.

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