
चौड़ी सड़कें, हवाई अड्डे, 46 बिलियन डॉलर निवेश... फिर भी क्यों पाकिस्तान में बलूचों को नहीं चाहिए 'चाइनीज डेवलेपमेंट'?
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Baloch Protest Against CPEC : बलूचिस्तान में चीन के सीपीईसी प्रोजेक्ट को लगातार बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. स्थानीय आबादी का विरोध प्रदर्शन और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे संगठनों के हमलों ने चीन के महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को बैकफुट पर धकेल दिया है.
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित ग्वादर बंदरगाह पर बुधवार को आतंकी हमला हुआ. कुछ हथियारबंद लोग ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी (जीपीए) के परिसर में घुसे और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. पाकिस्तानी अखबारों की रिपोर्ट्स का दावा है कि स्थानीय सुरक्षाकर्मियों ने जवाबी कार्रवाई में आठ हमलावरों को ढेर कर दिया. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है.
ग्वादर बंदरगाह चीन और पाकिस्तान के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) का सबसे अहम हिस्सा है. लेकिन बलूचिस्तान के लोग इसे अपने संसाधनों पर कब्जे के रूप में देखते हैं. यही वजह है कि लंबे समय इस इलाके में निर्माण कार्यों के शोर के बजाय खौफ और दहशत का सन्नाटा पसरा हुआ है. लेकिन वजहें कई और भी हैं. लंबे समय से आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में अगर चीन निवेश कर रहा है और स्थानीय लोगों को रोजगार देने का वादा कर रहा है तो बलूच इसका इतना हिंसक विरोध क्यों कर रहे हैं? आइए जानते हैं,
बंदरगाह पर चीन ने झोंके 46 बिलियन डॉलर
साल 2015 में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की घोषणा हुई थी. यानी करीब 2442 किमी लंबी सड़क जो चीन के शिंजियांग शहर को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ेगी. सीपीईसी के तहत चीन ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है और पानी की तरह पैसा बहा रहा है. इस पोर्ट पर चीन 46 बिलियन डॉलर खर्च कर चुका है. दरअसल चीन खाड़ी देशों से आने वाले तेल और गैस को बंदरगाह, रेलवे और सड़क के जरिए कम समय और कम खर्च में अपने देश तक पहुंचाना चाहता है.
2015 में वादा किया गया था कि सीपीईसी के तहत ग्वादर पोर्ट को एक नया रूप दिया जाएगा. लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए चीन ने इस प्रोजेक्ट की फंडिंग रोक दी. भ्रष्टाचार उतना बड़ा मुद्दा नहीं है. स्थानीय बलूचों के विरोध प्रदर्शन और हमलों ने चीन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. इस विरोध के कई कारण हैं.
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