
ग्राउंड रियलिटी: 'यूपी से बिहार तक नहीं पहुंच सकती बहकर लाशें, काशी को बदनाम करने की साजिश'
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गंगा और यमुना नदी में बड़ी संख्या में लाशें बहती हुईं मिलीं. सवाल ये उठ रहा था कि कहीं अंतिम संस्कार महंगा होने की वजह से तो इन्हें नदियों के जल में प्रवाहित नहीं किया गया है. इस मामले में आजतक की टीम ने पड़ताल की, तो सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आई है.
यूपी के गाजीपुर और बिहार के बक्सर में गंगा में दर्जनों प्रवाहित शवों के मिलने से हड़कंप मचा हुआ है. बिहार शासन प्रशासन ने सारा ठीकरा यूपी पर फोड़ते हुए बताया है कि ये शव गंगा में बहते हुए आए हैं. ऐसे में सवाल ये भी उठने लगे, कि कहीं लकड़ियों की महंगाई की वजह से तो लोग लाशों का अंतिम संस्कार नहीं करते हुए जल में प्रवाहित कर रहे हैं. इस पूरे मामले की जमीनी हकीकत टटोलने के लिए आजतक की टीम ने वाराणसी के महाश्मशान मणिकर्णिका का दौरा किया, जहां सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आई. पैसे के अभाव में मिलकर कराते हैं अंतिम संस्कार वाराणसी के महाश्मशान मणिकर्णिका पहुंची आजतक की टीम ने यहां लकड़ी व्यवासाई किशन कुमार से बात की, तो उन्होंने बताया कि लकड़ी का सामान्य भाव 400 रुपया मन का है और वही भाव अभी का भी है. उन्होंने बताया कि हफ्ता-दस दिनों पहले शव ज्यादा आ रहे थे, लेकिन अभी शव आना काफी कम हो चूके हैं. गंगा में शवों के जल प्रवाह करने के सवाल पर उन्होंने बताया कि जो लोग कभी सक्षम नहीं भी होते हैं, तो दुकानदार मिलकर निशुल्क शवदाह करा देते हैं. उन्होंने बताया कि सिर्फ उन्हीं शवों का जल प्रवाह होता है जिनको चर्म रोग होता है या फिर सर्पदंश से मौत या जिसकी अंतिम इच्छा जलप्रवाह की होती है, लेकिन कोई पैसों की मजबूरी के चलते लाश को गंगा में प्रवाहित करे यह संभव नहीं है.
दिल्ली के सदर बाजार में गोरखीमल धनपत राय की दुकान की रस्सी आज़ादी के बाद से ध्वजारोहण में निरंतर उपयोग की जाती है. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के बाद यह रस्सी नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाने लगी. इस रस्सी को सेना पूरी सम्मान के साथ लेने आती है, जो इसकी ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्ता को दर्शाता है. सदर बाजार की यह रस्सी भारत के स्वाधीनता संग्राम और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनी हुई है. देखिए रिपोर्ट.

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